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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५


तं पुरुषं कलानामात्मभूतं वेद्यं वेदनीयं पूर्णत्वात् पुरुषं पुरि शयनाद्वा वेद जानीयात्; यथा हे शिष्या मा वो युष्मान्मृत्युः परिव्यथा मा परिव्यथयतु । न चेद्विज्ञायेत पुरुषो मृत्युनिमित्तां व्यथामापन्ना दुःखिन एव यूयं स्थ । अतस्तन्मा भूद्युष्माकमित्यभिप्रायः ॥ ६ ॥आत्मभूत उस ज्ञातव्य पुरुषको, जो सर्वत्र पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष कहलाता है, जानो; जिससे कि हे शिष्यो ! तुम्हें मृत्यु सब ओरसे व्यथित न करें । यदि तुमने उस पुरुषको न जाना तो तुम मृत्युनिमित्तक व्यथाको प्राप्त होकर दुःखी ही होगे । अतः तुम्हें वह दुःख प्राप्त न हो, यही इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥

उपदेशका उपसंहार

तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥

तब उनसे उस (पिप्पलाद मुनि) ने कहा—'इस परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे अन्य और कुछ [ ज्ञातव्य ] नहीं है ॥७॥

तानेवमनुशिष्य शिष्यांस्तान् होवाच पिप्पलादः किलैतावदेव वेद्यं परं ब्रह्म वेद विजानाम्यहमेतत् । नातोऽस्मात्परमस्ति प्रकृष्टतरं वेदितव्यमित्येवमुक्तवाञ्छिष्याणामविदितशेषास्तित्वाशङ्कानिवृत्तये कृतार्थबुद्धिजननार्थं च ॥ ७ ॥उन शिष्योंको इस प्रकार शिक्षा दे पिप्पलाद मुनिने उनसे कहा—'उस वेद्य (ज्ञातव्य) परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे पर-उत्कृष्टतर और कोई वेद्य नहीं है । इस प्रकार 'अभी कुछ बिना जाना रह गया' ऐसी शिष्योंकी आशंकाकी निवृत्तिके लिये तथा उनमें कृतार्थबुद्धि उत्पन्न करनेके लिये पिप्पलादने उनसे कहा ॥७॥