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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रश्न ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०१

मानेऽचेतने प्रधाने चेतनवदुपचारोऽयं 'स ईक्षांचक्रे' इत्यादिः। यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये राजेति तद्वत् ।अचेतन प्रधानमें चेतनकी भाँति 'उसने विचार किया' इत्यादि प्रयोग औपचारिक है; जैसे राजाका सारा कार्य करनेवाले सेवकको भी 'राजा' कहा जाता है, उसीके समान इसे समझना चाहिये ।
न; आत्मनो भोक्तृत्ववत्कर्तृत्वोपपत्तेः। (सांख्यमत-निरसनम्) यथा सांख्यस्य चिन्मात्रस्यापरिणामिनोऽप्यात्मनो भोक्तृत्वं तद्वद्वेदवादिनामीक्षादिपूर्वकं जगत्कर्तृत्वमुपपन्नं श्रुतिप्रामाण्यात् ।**सिद्धान्ती—**ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि आत्माके भोक्तृत्वके समान उसका कर्तृत्व भी बन सकता है। जिस प्रकार सांख्यमतमें चिन्मात्र और अपरिणामी आत्माका भोक्तृत्व सम्भव है उसी प्रकार श्रुति-प्रमाणसे वेदवादियोंके मतमें उसका ईक्षणपूर्वक कर्तृत्व भी बन सकता है।
तत्त्वान्तरपरिणाम आत्मनोऽनित्यत्वाशुद्धत्वानेकत्वनिमित्तो न चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया । अतः पुरुषस्य स्वात्मन्येव भोक्तृत्वे चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया न दोषाय। भवतां पुनर्वेदवादिनां सृष्टिकर्तृत्वे तत्त्वान्तरपरिणाम एवेत्यात्मनोऽनित्यत्वादिसर्वदोषप्रसङ्ग इति चेत् ।**पूर्व०—**आत्माका तत्त्वान्तर परिणाम ही उसके अनित्यत्व, अशुद्धत्व और अनेकत्वका कारण है, चिन्मात्र-स्वरूपका विकार नहीं। अतः पुरुषका अपनेमें ही भोक्तृत्व रहनेके कारण उसका चिन्मात्रस्वरूप विकार किसी प्रकारके दोषका कारण नहीं है । किन्तु आप वेदवादियोंके मतानुसार सृष्टिका कर्तृत्व माननेमें तो उसका तत्त्वान्तरपरिणाम ही मानना होगा और इससे आत्माके अनित्यत्व आदि सब प्रकारके दोषोंका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा ।