प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
षष्ठोऽध्यायः १०६
केसरी आदि प्रासादो की तल विभक्ति आठ है। उनमें क्रमशः एक, दो, तीन, तीन, तीन,
चार, चार और पाच प्रासाद है। अर्थात् आठ तल वाला प्रथम एक प्रासाद; दस तल का दूसरा और
तीसरा ये दो; बारह तल का चौथा, पाचवां और छट्ठा ये तीन प्रासाद; चौदह तल का सातवां,
आठवां और नवां ये तीन प्रासाद; सोलह तलका दसवां, ग्यारहवां और बारहवा ये तीन
प्रासाद, अठारह तलका तेरहवां, चौदहवां, पद्रहवां और सोलहवां ये चार प्रासाद; बीस तलका
सत्रहवां, अठारहवां, उन्नीसवां और बीसवा ये चार प्रासाद और बाईस तलका इक्कीस से
पच्चीस तक के पांच प्रासाद हैं। ऐसा किसी (क्षीरार्णव) का मत है ॥१४॥
शिखरं त्वेकवेदैकं षट्त्रिवेदयुगद्वयम् ।
तलेषु क्रमशः प्रोक्तो मूलसूत्रेऽपराजिते ॥१५॥
केसरी प्रासादों मे प्रथम आठ तलका, दोसे पांच ये चार प्रासाद दस तलका, छट्ठा
एक प्रासाद बारह तलका, सात से बारह ये छः प्रासाद चौदह तलका, १३ से १५ ये तीन
प्रासाद सोलह तलका, १६ से १९ ये चार प्रासाद अठारह तलका, २० से २३ ये चार प्रासाद
बीस तलका और चौबीसवां और पच्चीसवा ये दो प्रासाद बाईस तलका होता है। यह मूलसूत्र
अपराजितपृच्छा का मत है ॥१५॥
तलेष्वष्टासु विहिताः प्रासादाः पञ्चविंशतिः ।
त्रयस्त्रयः क्रमेणैव चत्वारस्त्वष्टमे तले ॥१६॥
केसरी आदि पच्चीस प्रासादों की जो आठ तल विभक्ति हैं, उनमें प्रत्येक तल के तीन २
प्रासाद है और आठवा बाईस विभागीय तल के चार प्रासाद है ॥१६॥
त्रीणि त्रीणि स्वकीयानि द्वे द्वे परः परस्य च ।
शिखराणि विधेयानि विश्वकर्मवचो यथा ॥१७॥
ऊपर १६ वे श्लोक मे तलो के तीन २ प्रासाद बनाने की जो बात कही गई है। यह मेरा
स्वयं (मंडन) का मत है और नीचे के श्लोक १८ वे मे दो दो आदि प्रासाद लिखा है, यह
दूसरे का मत है। ये पच्चीस प्रासाद विश्वकर्मा के वचन के अनुसार बनाये हैं ॥१७॥
'द्विद्वये कपट्त्रयोऽष्टादि-तलेषु पञ्चसु क्रमात् ।
सप्तैव सप्तमे षष्ठे शिरांसि त्रीणि चाष्टमे ॥१८॥
१. 'द्विद्व्येक'
११० प्रासादमण्डने
आठ तल विभक्तियों में से पहले पांच तल विभक्ति के अनुक्रम से दो, दो, एक, छह और
तीन प्रासाद हैं। छठी तल विभक्ति का एक प्रासाद, सातवीं तल विभक्ति के सात और
आठवीं तल विभक्ति के तीन प्रासाद हैं ॥१८॥
भेदाः पञ्चाशदेकैकं प्रोक्ताः श्रीविश्वकर्मणा ।
तेनैकस्मिंस्तलेऽपि स्युः शिखराणि बहून्यपि ॥१९॥
केशरी आदि प्रत्येक प्रासाद के पचास २ भेद श्री विश्वकर्माजी ने किये हैं। एकही प्रासाद
तल के ऊपर अनेक प्रकार के शिखर बनाये जाते हैं ॥१९॥
रथिकां सिंहकर्णं च भद्रे कुर्याद् गवाक्षकान् ।
प्रत्यङ्गैस्तिलकाद्यैश्च शोभितं सुरमन्दिरम् ॥२०॥
रथिका, सिंहकर्ण, भद्र में गवाक्ष, प्रत्यंग और तिलक आदि आभूषणों से देवालय को
सुशोभित बनावें ॥२०॥
प्रासादाः केसरीमुख्याः सर्वदेवेषु पूजिताः ।
पुरराज्ञः प्रजादीनां कर्तुः कल्याणकारिकाः ॥२१॥
इति केसर्यादिप्रासादाः पञ्चविंशतिः ।
केशरी आदि जो पच्चीस प्रासाद हैं, वे सब देवों के लिये पूजित हैं। इसलिये बनानेवाले
तथा नगर के राजा और प्रजा का कल्याण करने वाले हैं ॥२१॥
निरंधार प्रसाद—
षट्त्रिंशत्करतोऽधस्ताद् यावद्धस्तचतुष्टयम् ।
विना भ्रमैर्निरन्धाराः कर्त्तव्याः शान्तिमिच्छता ॥२२॥
छत्तीश हाथ से न्यून चार हाथ तक, अर्थात् चार हाथ से लेकर छत्तीस हाथ तक के
विस्तार वाले प्रासाद शान्ति को चाहने वाले शिल्पी भ्रम (परिक्रमा) बिनाके निरंधार
(प्रकार वाले) भी बना सकता है। निरंधार प्रासादको परिक्रमा नहीं बनावें ॥२२॥
प्रासादतलाकृतिः—
वास्तोः पञ्चविधं क्षेत्रं चतुरस्रं तथायतम् ।
वृत्तं वृत्तायतं चैवाष्टास्रं१ देवालयादिषु ॥२३॥
१. अष्टास्रं देवालयादनु ।
षष्ठोऽध्यायः १११
चौरस, लंब चौरस, गोल, लंबगोल और आठ कोना वाला, इस प्रकार पांच आकार के
देवालय आदि के वास्तुक्षेत्र हैं ॥२३॥
लम्बचोरस प्रासाद—
विस्तारे तु चतुर्भाग-मायामे पञ्चभागिकम् ।
ऊर्ध्वं त्रिकलशान् कुर्यात् पृष्ठाग्रे सिंहकर्णकम् ॥२४॥
लंब चौरस प्रासाद के विस्तार में चार भाग और लंबाई मे पांच भाग करना चाहिये
और उसके छाद्य के ऊपर तीन गुम्बद (कलश) रखना चाहिये। तथा आगे और पीछे के
चारों कोने पर सिंह रखना चाहिये।
गोल, लंबगोल और अष्टास्र प्रासाद—
वृत्तायतं च कर्त्तव्यं व्यासार्धं वामदक्षिणे ।
कर्णान्तं च भ्रामयेद् वृत्तं २भद्राणि चाष्टकोणिका ॥२५॥
प्रासादो वर्तुलोऽष्टास्रः प्रायेणैकाण्डकः शुभः ।
कर्णे वा श्रेणयोऽण्डानां मण्डपं तत्स्वरूपकम् ॥२६॥
इति पंचक्षेत्राणि ।
गोल प्रासाद के विस्तार का आधा भाग गोल के दोनो तरफ बढ़ावे तो लंबगोल प्रासाद
होता है। तलके मध्यबिंदु से कोने तक व्यासार्ध मान करके एक गोल खींचा जाय तो गोल-
प्रासादतल होता है। चौरस प्रासाद के चार भद्रो में कोना बनाया जाय तो अष्टास्र प्रासाद
होता है। गोल और अष्टास्र प्रासाद प्रायः करके एक शिखर वाला बनाना शुभ है। अथवा
शिखर के कोने मे शृंगो की पंक्ति रखनी चाहिये। इन प्रासादों का मंडप भी इसी स्वरूप का
बनाना चाहिये ॥२५-२६॥
नागर प्रासाद—
विविधै रूपसङ्घाटै-र्भद्रैर्गवाक्षभूषितैः ।
वितानफालनाभृङ्गै-रनेकैकैर्नागरा मताः ॥२७॥
अनेक प्रकार के तलाकृति वाले रूपों से, गवाक्ष वाले भद्रों से तथा अनेक प्रकार के
गुम्बदो से और अनेक शृंगयुक्त फालनाओं से शोभायमान नागर जाति का प्रासाद बनाया
जाता है ॥२७॥
२. वृत्ते भद्राणि चाष्ट हि ।
११२ प्रासादमण्डने
द्राविड प्रासाद—
पीठोपरि भवेद् वेदी पीठानि त्रीणि पञ्च वा ।
पीठतो द्राविडे रेखा लताशृङ्गादिसंयुता ॥२८॥
द्राविड प्रासाद को पादबंधनादि तीन अथवा पांच पीठ हैं, इस पीठ के ऊपर वेदी होती
है। तथा उसको रेखा (कोना) लता और शृंगों वाली होती है ॥२८॥
भूमिजप्रासाद—
भूमिकोपरिभूमिश्च १ह्रस्वा ह्रस्त्रा नवान्तकम् ।
विभक्तदलसंयुक्ता मूर्ध्नि शृङ्गेण भूमिजाः ॥२६॥
भूमिज जाति के प्रासाद एक के ऊपर एक ऐसे नव भूमि (माल) तक बनाया जाता
है। उसमें नीचे के मालसे ऊपर का माल छोटा २ किया जाता है। पदविभक्ति वाला और ऊपर
शृंग वाला भूमिज प्रासाद है ॥२६॥
लतिन श्रीवत्स और नागर जातिके प्रासाद—
शृङ्गेणैकेन लतिनाः श्रीवत्सा२ वारिसंयुताः ।
नागरा भ्रमसंयुक्ताः सान्धारास्ते प्रकीर्तिताः ॥३०॥
इति प्रासादजातय ।
लतिन जाति के प्रासाद एक शृंग वाले है, श्रोवत्स प्रासाद वारि मार्ग वाले हैं। नागर
प्रासाद भ्रम (परिक्रमा) वाले है, उसको सांधार प्रासाद कहते है ॥३०॥
मेरुप्रासाद —
पञ्चहस्तो भवेन्मेरु–रेकोत्तरशताण्डकः ।
भेदाः पञ्चोनपञ्चाशत् करवृद्ध्या भवन्ति ते ॥३१॥
हस्ते हस्ते भवेद् वृद्धि–स्त्वण्डकानां च विंशतिः ।
एकोत्तरसहस्रं स्या–च्छृङ्गाणां च शताद्धिके ॥३२॥
मेरु प्रासाद पांच हाथ से न्यून नहीं बनाया जाता । पांच हाथ के विस्तार वाले
मेरु प्रासाद के ऊपर एकसौ एक शृंग चढ़ाये जाते है। यह पांच हाथ से एक २ हाथ पचास हाथ
तक बढ़ाने से पैंतालीस भेद होते है। बढ़ाये हुए प्रत्येक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ऊपर
१. 'ह्रस्वावर्कनवान्तकम्'. इति पाठान्तरे । २. 'श्रीवत्साम्बुपथान्विताः।'
३. यहा पञ्चाडी नवांडी आदि चार२ क्रम समझने का है ।
मोनाक्षाजी देवी के मंदिर की जगती के द्वार ऊपर का
गोपुर मडप - मदुरा ( दक्षिण )
तिरुवण्णाम् (दक्षिण) के मंदिर का एक गोपुर मंडप
षष्ठोऽध्यायः ११३
क्रमशः बीस २ शृंग अधिक चढाये जाते है। जैसे-पांच हाथ के विस्तार वाले मेरु प्रासाद के
ऊपर एक सौ एक, छह हाथ के प्रासाद के ऊपर एकसौ इक्कीस, सात हाथ के प्रासाद के ऊपर
एकसौ इकतालीस, इस प्रकार बीस २ शृंग बढ़ाते हुए पचास हाथ के मेरु प्रासाद के ऊपर
एक हजार एक शृंग हो जाते है ॥३१-३२॥
विमान नागर प्रासाद—
केसरिप्रमुखाः कर्णे विमानमुरुशृंगकम् ।
तथैव मूलशिखरं पञ्चभूमिविमानकम् ॥३३॥
विमाननागरा जाति-स्तदा प्राज्ञैरुदाहृता ।
एवं शृङ्गैरुरुशृङ्गाणि सम्भवन्ति बहून्यपि ॥३४॥
जिस प्रासाद के कोने के ऊपर केसरी आदि के अनेक शृंग हों, और भद्र के ऊपर
उरुशृंग हो, तथा मूल शिखर पांच भूमि (माल) वाला विमानाकार हो, इसको विद्वानो ने
विमाननागर जाति का प्रासाद कहा है। इसके ऊपर अनेक शृंग और उरुशृंग
होते हैं ॥३३-३४॥
*१-श्रीमेरुप्रासाद और २-हेमशीर्ष मेरुप्रासाद—
श्रीमेरुरष्टभागः स्या-देकोत्तरशताण्डकः ।
हेमशीर्षो दशांशश्च युतः सार्धशताण्डकैः ॥३५॥
पहला श्रीमेरुप्रासाद आठ तलविभक्ति वाला और एकसौ एक शृंग वाला है। दूसरा
हेमशीर्ष मेरुप्रासाद दश तल विभक्तिवाला और डेढ़सौ शृंगवाला है ॥३५॥
३-सुरवल्लभ मेरुप्रासाद—
भागैर्द्वादशभिर्युक्तः सार्धद्विशतसंयुतः :
सुरवल्लभनामा तु प्रोक्तः श्रीविश्वकर्मणा ॥३६॥
कर्णो द्विभाग एकांशा कोणी सार्धः प्रतिरथः ।
अर्धांशा नन्दिका भद्र-मर्धं भागेन सम्मितम् ॥३७॥
तीसरा सुरवल्लभ नाम का मेरु प्रासाद बारह तल विभक्ति वाला और दोसौ पचास
(ढाईसौ) शृंगवाला है। ऐसा श्री विश्वकर्माजी ने कहा है। कोना दो भाग, कोणी एक भाग,
- ये नव मेरु प्रासाद का स्वरूप सविस्तर जानने के लिए देखो अपराजित पृच्छा सूत्र. १८०
प्रा० १५
११४ प्रासादमण्डने
प्रतिरथ डेढ़ भाग, कोशी आधा भाग और भद्रार्ध एक भाग, इस प्रकार बारह भाग की तल
विभक्ति है ॥३६-३७॥
४-भुवनमण्डन मेरुप्रासाद-
त्रिशतं पञ्चसप्तत्या--धिकैर्याण्डकैः सह ।
भक्तश्चतुर्दशांशैस्तु नाम्ना भुवनमण्डनः ॥३८॥
कोणः कोणी प्रतिरथो नन्दी भद्रार्धमेव च ।
द्वये कद्वयर्थांशसार्धांशै-श्चतुर्दशविभाजिते ॥३६॥
चौथा भुवनमण्डन नाम का मेरुप्रासाद तीनसौ पचहत्तर शृंगवाला है। इसके तलका
चौदह विभाग करे। उनमें से कोण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, कोणी
आधा भाग और भद्रार्ध डेढ़ भाग रखे ॥३८-३६॥
५-रत्नशीर्ष मेरुप्रासाद-
बाणैकवेदयुग्मांशा वेदाः कर्णादिभागतः ।
रत्नशीर्षो भवेन्मेरुः पञ्चशतैकभृङ्गकैः ॥४०॥
पांचवां रत्नशीर्ष मेरु प्रासाद के तलका बत्तीस भाग करे। उनमें से पांच भाग का
कोना, एक भाग की कोनी, चार भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नन्दी और चार भाग का
भद्रार्ध रखे । इस प्रासाद के ऊपर पांचसौ एक शृंग है ॥४०॥
६-किरणोद्भव मेरुप्रासाद-
गुणैकयुग्मचन्द्रद्वौ पुराणांशैर्विभाजिते ।
किरणोद्भवमेरुश्च सपादषट्शताण्डकः ॥४१॥
छट्ठा किरणोद्भव मेरु प्रासाद के तल का अठारह भाग करे। उनमें से तीन भाग का
कोण, एक भाग की कोणी, दो भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नन्दी और दो भाग का
भद्रार्ध रखे । इस प्रासाद के ऊपर छसौ पच्चीस शृंग है ॥४१॥
७--कमलहंस मेरुप्रासाद--
रामचन्द्रद्वियुग्मांशै-र्नेत्रैर्विंशतिभाजिते ।
नाम्ना कमलहंसः स्यात् सार्धसप्तशताण्डकः ॥४२॥
सातवां कमलहंस नामके मेरु प्रासाद के तलका बीस भाग करना चाहिये । उनमें से
षष्ठोऽध्यायः ११५
तीन भाग का कोना, एक भाग की कोनी, दो भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नंदी और दो
भाग का भद्रार्थ रक्खे । इस प्रासाद के ऊपर सातसो पचास शृंग है ॥४२॥
८-स्वर्णकेतु मेरुप्रासाद-
भागैः कर्णादिगर्भान्तं १वेदार्थसार्धत्र्येकांशैः ।
द्वाभ्यां च स्वर्णकेतुः स्यात् पञ्चसप्ताष्टशृङ्गकैः ॥४३॥
आठवा स्वर्णकेतु नामके मेरु प्रासाद के तलका बाईस भाग करे । इनमे से चार भाग का
कोना, आधे भाग की कोणी, साढे तीन भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नंदी और दो भाग का
भद्रार्थ बनावे । इस प्रासाद के ऊपर आठसौ पच्चहत्तर शृंग है ॥४३॥
६-वृषभध्वज मेरुप्रासाद-
वेदैकरामयुग्मांशै-र्नेत्रैर्जिनविभाजिते ।
वृषभध्वजमेरुश्च सैकाएडकसहस्रवान् ॥४४॥
नववां वृषभध्वज मेरु प्रासाद के तलका चौबीस भाग करे । इनमे से चार भाग का
कोना, एक भाग की कोनी, तीन भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रार्थ
रक्खे । यह प्रासाद एक हजार एक शृंग वाला है॥४४॥
सभ्रमो भ्रमहीनश्च महामेरुश्च भद्वयम् ।
सान्धारेषु प्रकर्त्तव्यं भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥४५॥
उपरोक्त नव महामेरु प्रासाद भ्रम ( परिक्रमा ) वाले अथवा विना भ्रमवाले बनाये जाते
है । एवं दो भ्रमवाले भी बनाये जाते है । यदि दो भ्रमवाले सान्धार मेरु प्रासाद बनाया जाय
तब उसके भद्र मे चंद्रावलोकन करना चाहिये अर्थात् प्रकाश के लिये जाली या गवाक्ष बनाना
चाहिये ॥४५॥
राज्ञः स्यात् प्रथमो मेरु-स्ततो हीनो २द्विजादिकः ।
विना राज्ञोऽन्यवर्णेन कृते मेरौ महद्भयम् ॥४६॥
इति नवमेरुलक्षणम् ।
इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे केसर्यादि
प्रासादजातिलक्षणे पञ्चचत्वारिंशन्मेरुलक्षणे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
१. 'वेदासार्ध'त्रिसार्द्धकैः ।' २. 'ऽन्यवर्णजः ।'
११६ प्रासादमण्डने
मेरुप्रासाद राजालोग बनावें। धनिक लोग मेरुप्रासाद से न्यून प्रासाद बनावे, अर्थात्
मेरुप्रासाद नही बनावे । यदि बनावें तो राजा के साथ बनावें । राजा के बिना अकेले धनिक
द्वारा बनाया हुआ मेरुप्रासाद बड़ा भयकारक माना है ॥४६॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन द्वारा अनुवादित प्रासादमण्डन का केसर्यादि-
प्रासाद लक्षणनाम का छट्ठा अध्याय की सुबोधिनी नामकी
भाषाटीका समाप्त ॥६॥
अथ प्रासादमण्डने सप्तमोऽध्यायः
मंडप विधान—
रत्नगर्भाङ्कनं सूर्यचन्द्रतारावितानकम् ।
विचित्रं मण्डपं येन कृतं तस्मै नमः सदा ॥१॥
लगे हुए रत्नवाले तथा सूर्य चंद्रमा और तारे जैसा तेजस्वी वितान (गुम्बद का पेटा
भाग चांदनी) वाले, ऐसे अनेक प्रकार के मण्डपो की जिसने रचना की है, उनको हमेशा
नमस्कार है ॥१॥
गर्भाग्रमंडप—
कर्णगूढा विलोक्याश्च एकत्रिकद्वारसंयुताः ।
प्रासादाग्रे प्रकर्त्तव्याः सर्वदेवेषु मण्डपाः ॥२॥
गूढ़ कोना वाला अर्थात् दीवार वाला अथवा बिना दीवार वाला खुला, तथा एक
अथवा तीन द्वारवाला, ऐसा मंडप सब देवो के प्रासाद के आगे किया जाता है ॥२॥
जिनप्रासाद के मंडप—
गूढस्त्रिकस्तथा नृत्यः क्रमेण मण्डपास्त्रयः ।
जिनस्याग्रे प्रकर्त्तव्याः सर्वेषां तु बलाणकम् ॥३॥
जिनदेव के गर्भगृह के आगे गूढ मण्डप, इसके आगे चौकी वाले त्रिकमडप और इसके
आगे नृत्यमंडप, इस प्रकार अनुक्रम से तीन मंडप बनावे । बाकी सब देवो के गर्भगृह के आगे
बलाणक बनावे ॥३॥
मंडपके पांच मान—
समं सपादं प्रासादात् सार्धं च पादोनद्वयम् ।
द्विगुणं वा प्रकर्त्तव्यं मण्डपं पञ्चधा मतम् ॥४॥
मंडप का नाप प्रासाद के बराबर, सवाया, डेढा, पौने दुगना अथवा दुगना किया जाता
है । ये मंडप के पांच प्रकार के नाप हैं ॥४॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ मे सवा दो गुणा और ढाई गुणा ये दो प्रकार का अधिक
नाप मिलाकर सात प्रकार के मंडप के नाप लिखे हैं ।
११८
प्रासादमण्डने
गर्भगृह
कौली
(अन्तराल)
गूढ मण्डप
चतुष्किका
चतुष्किका
त्रिक मण्डप
त्रिमण्डप
नव चतुष्किका
त्रिक मण्डप
चतुष्किका
नृत्य मण्डप.
रंगमण्डप
चतुष्किका
शृंगार चौकी
प्रासाद और मडपों का तलदर्शन
११६
। से दश
हाथ के
को सिर्फ
र जानना
। चाहिये ।
। अधिक
। न्यूना न
। न न्यून
प मे स्तंभ,
रहा है कि-
है। परन्तु
नही माना
सम चतुरस्र प्रासाद
(प्रासाद मण्डन अ. ७)
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सप्तमोऽध्यायः ११६
प्रासादमान से मंडप का माप—
समं सपादं पञ्चाशतपर्यन्तं दशहस्तकात् (तः) ।
दशान्तं पञ्चतः सार्धं द्विपा दोनं चतुष्करे ॥५॥
त्रिहस्ते द्विगुणं द्वयेक-हस्ते कुर्याच्चतुष्किकाम् ।
प्रायेण मण्डपं सार्धं द्विगुणं प्रत्यलिन्दकैः ॥६॥
दश हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद को समान अथवा सवाया, पांच हाथ से दश
हाथ तक के प्रासाद को डेढा, चार हाथ के प्रासाद को पौने दो गुना और तीन हाथ के
विस्तार वाले प्रासाद को दुगुना मंडप बनाना चाहिये। दो और एक हाथ के प्रासाद को सिर्फ
चौकी बनावे। प्रायः करके मण्डप का प्रमाण डेढ़ा या दुगना अलिन्द के अनुसार जानना
चाहिये ॥५-६॥
गूमट के घंटा कलश और शुकनास का मान—
मण्डपे स्तम्भपट्टादि-र्मध्यपट्टानुसारतः ।
शुकनाससमा घण्टा न्यूना श्रेष्ठा न चाधिका ॥७॥
मण्डप मे स्तंभ और पाट आदि सब गर्भगृह के पट्ट आदि के अनुसार रखना चाहिये ।
मण्डप के गूमट के घंटा कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रखना चाहिये । कम या अधिक
नहीं रखनी चाहिये ॥७॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ श्लोक १० मे लिखा है कि—'शुकनाससमा घण्टा न न्यूना न
ततोऽधिका ।' अर्थात् गूमट के आमलसार कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रक्खे । न न्यून
न अधिक रक्खे ।
मंडप के समविषम तल—
मुखमण्डपसङ्घाटो यदा भित्त्यन्तरे भवेत् ।
न दोषः स्तम्भपट्टाद्यैः समं च विषमं तलम् ॥८॥
गर्भगृह और मुखमंडप के बीच मे यदि भित्त (दीवार) का अंतर हो तो मंडप मे स्तंभ,
पट्ट और तल ये समविषम किया जाय, तो दोष नहीं है । अर्थात् ऊपर के श्लोक मे कहा है कि-
गर्भगृह के पट्ट स्तंभ के अनुसार बराबर मे मंडप के पट्ट स्तंभ आदि रखा जाता है । परन्तु
इन दोनो के बीच मे दीवार का अंतर हो तो सम विषम रखा जाय तो दोष नही माना
जाता ॥८॥
१२० प्रासादमण्डने
*मुखमंडप—
नवाष्टदशभागेषु त्रिभिश्चन्द्रावलोकनम् ।
हस्तैकं त्र्यङ्गुलोनं वा तदूर्ध्वं मत्तवारणम् ॥६॥
गर्भगृह के आगे मुखमंडप है, उसके उदयका साढे तेरह, साढे चौदह अथवा साढे पंद्रह
भाग करें। उनमें से आठ, नव अथवा दस भाग का चंद्रावलोकन (खुला भाग) रखें। तथा
आसनपट्ट के ऊपर एक हाथ का अथवा इक्कीस अंगुल का मत्तवारण (कठहरा) बनावे ॥६॥
सार्धपञ्चांशकैर्भक्तैः सपादं राजसेनकम् ।
सपादत्र्यंशका वेदी भागेनासनपट्टकम् ॥१०॥
खुले भाग के नीचे से मंडप के तल तक साढे पांच
भाग करे। उनमें से सवा भाग का राजसेन, सवातीन भाग
की वेदी और एक भाग का आसनपट्ट बनावे ॥१०॥
तदूर्ध्वं सार्धसप्तांशा यावत्पट्टस्य पेटकम् ।
सार्धपञ्चांशकः स्तम्भः पादोनं भरणां भवेत् ॥११॥
भागार्धं भरणां वापि सपादं सार्धतः शिरः ।
आसनपट्ट के ऊपर से पाट के तलभाग तक साढे सात
भाग करे। उनमें से साढे पांच भाग का स्तम्भ रक्खें।
उसके ऊपर पौन अथवा आधे भाग की भरणी और इसके
ऊपर सवा या डेढ़ भाग की शिरावटी रखें ॥११॥
पट्टो द्विभागस्तस्योर्ध्वं कर्त्तव्यश्छाद्यकोदयः ॥१२॥
त्रिभागं: ललितं छाद्यं यावत्¹ पट्टस्य पेटकम् ।
अर्धांशोर्ध्वा कपोतालि-द्विभागः पट्टविस्तरः ॥१३॥
शिरावटी के ऊपर दो भागका पाट रक्खे। उसके
ऊपर तीन भाग निकलता और पाट के पेटा भाग तक नमा
हुआ सुन्दर छज्जा बनावे। उसके ऊपर आधे भाग की
केवल बनावें, पाट का विस्तार दो भाग रक्खे ॥१२-१३॥
मुखमंडप
- विशेष जानकारी के लिए देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ५ से १३ तक
१. तत्पेटं पट्टपेटकम् ।
लूणवसही जैन मंदिर आबू के मडप का दृश्य
अनुपम कोतरणी वाला स्तभ
आबू जैन मंदिर के मडप के स्तभ और इलिका तोरण
सप्तमोऽध्यायः १२१
स्तंभ का विस्तारमान और भेद—
प्रासादाद् दशरुद्रार्क-भागेन स्तम्भविस्तरः ।
वेदाष्टरविविंशत्यः कर्णा वृत्तस्तु पञ्चधा ॥१४॥
प्रासाद के दसवा, ग्यारहवा अथवा बारहवा भागके बराबर स्तंभ का विस्तार (मोटाई)
रक्खे । तथा चार, आठ, बारह और बीस कोना वाला और गोल, ऐसे पाच प्रकार के
स्तंभ हैं ॥१४॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ३५ मे तेरहवा और चौदहवा भाग के बराबर भी
स्तंभ का विस्तार रखना लिखा है ।
आकृति से स्तंभसंज्ञा—
"चतुरस्रश्च रुचका भद्रका भद्रसंयुताः ।
वर्द्धमानाः प्रतिरथैस्तथाष्टाश्रैश्चाष्टास्रकाः ॥
ग्रासनोर्ध्वं भवेद् भद्र-मष्टकर्णोस्तु स्वस्तिकाः ।
प्रकर्त्तव्या पञ्चविधा स्तम्भाः प्रासादरूपिणः ।।” अप० सू० १८४
चार कोना वाला चतुरस्र, भद्रवाला भद्रक, प्रतिरथवाला वर्द्धमान, आठ कोना वाला
अष्टास्र और ग्रासन के ऊपर से भद्र और आठ कोना वाला स्वस्तिक नाम का स्तंभ कहा जाता
है । ये पांच प्रकार के स्तंभ प्रासाद के अनुसार बनाना चाहिये ।
क्षीरार्णवग्रंथ के अनुसार स्तंभ का विस्तार मान—
“एकहस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
द्वौ हस्ते चाङ्गुलं सप्त त्रिहस्ते च नवाङ्गुलः ॥
तस्योर्ध्वं दशहस्तानां हस्ते हस्ते च द्वयङ्गुला ।
सपादाङ्गुला वृद्धिः स्यात् त्रिंशद्धस्ते यदा भवेत् ॥
अङ्गुलैका ततो वृद्धि-श्चत्वारिंशच्च हस्तके ।
तस्योर्ध्वं च शतार्द्धं च पादोनमङ्गुलं भवेत् ॥”
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तंभ चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद का स्तंभ
सात अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद का स्तंभ नव अंगुल, चार से दश हाथ के प्रासाद का स्तंभ
प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ सवा सवा अंगुल,
इकतीस से चालीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ एक एक अगुल और इकतालीस से
प्रा० १६
१२२ प्रासादमण्डने
पच्चास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तंभ पौन पौन अंगुल बढाकर स्तंभ का विस्तार
करना चाहिये ।
स्तंभका अन्य विस्तार मान—
“एक हस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
सप्ताङ्गुलश्च द्विहस्ते त्रिहस्ते तु नवाङ्गुलः ॥
द्वादशाङ्गुलविस्तारः प्रासादे चतुर्हस्तके ।
चतुर्हस्तादितः कृत्वा यावद् द्वादशहस्तकम् ॥
सार्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्ते विवर्द्धयेत् ।
द्वादशहस्तस्योर्ध्वं तु यावत् त्रिशद्धस्तकम् ॥
अङ्गुलैका ततो वृद्धिर्हस्ते हस्ते प्रदापयेत् ।
अत ऊर्ध्वं ततः कुर्याद् यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः कर्त्तव्या शिल्पिभिः सदा ।
उच्छ्रयं चतुर्गुणं प्रोक्तमेतत्स्तम्भस्य लक्षणम् ॥”
इति ज्ञानप्रकाशदीपार्णवे ।
एक हाथ के प्रासाद मे स्तंभ का विस्तार चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद में सात
अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में नव अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में बारह अंगुल रक्खे ।
पीछे पांच हाथ से बारह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ डेढ़ डेढ़ अंगुल, तेरह हाथ
से तीस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक एक अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा आधा अंगुल बढा करके स्तंभ का विस्तार रक्खे और विस्तार से
चार गुणी स्तंभ की ऊंचाई रक्खे ।
प्राग्ग्रीव मंडप—
द्वाराग्रे स्तम्भवेद्याद्या प्राग्ग्रीवो मण्डपो भवेत् ।
द्विद्विस्तम्भविवृद्धया च षोडशैव प्रकीर्त्तिताः ॥१५॥
प्रासाद के द्वारके आगे दो स्तंभवाली प्रथम वेदी है, वह प्राग्ग्रीव मंडप है । उनमें दो २
स्तंभ बढ़ाने से सोलह प्रकार का प्राग्ग्रीव मंडप होता है ॥१५॥
विशेष जानने के लिये देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८८ श्लोक १ से ११
आठ जाति के गूढ मंडप—
भित्तिः प्रसादवद् गूढे मण्डपेऽष्टविधेषु च ।
चतुरस्रः सुभद्रश्च तथा प्रतिरथान्वितः ॥१६॥