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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

६४ प्रासादमण्डने
तैयार हुए प्रासाद के शिखर को ध्वजा रहित देखकर असुर (राक्षस) उसमे रहने की
इच्छा करते है । इसलिये देवालय ध्वजा रहित नहीं रखना चाहिये ॥४८॥
ध्वजोच्छ्रायेण तुष्यन्ति देवाश्च पितरस्तथा ।
दशाश्वमेधिकं पुण्यं सर्वतीर्थधरादिकम् ॥४६॥
देवालय के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से देव और पितर संतुष्ट होते है । तथा दशाश्वमेध यज्ञ
करने से और समस्त भूतल की तीर्थयात्रा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य प्रासाद के
ऊपर ध्वजा चढ़ाने से होता है ॥४६॥
पञ्चाशत् पूर्वतः पश्चाद्-आत्मानं च तथाधिकम् ।
शतमेकोत्तरं सोऽपि तारयेन्नरकार्णवात् ॥५०॥
इति ध्वजलक्षणं पुण्याधिकारः ।
इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे प्रतिमा-
प्रमाणदृष्टिपदस्थानशिखरध्वजाकलशलक्षणाधिकारश्चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
ध्वजा चढ़ानेवाले के वंश की पहले की पचास और पीछे की पचास, तथा एक अपनी
इस तरह कुल एकसौ एक पीढ़ी के पूर्वजों को नरकरूपी समुद्र से यह ध्वजा तिरा देती है
अर्थात् उद्धार करती है ॥५०॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासादमण्डन ग्रन्थ के चौथा-
अध्ययन की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ॥४॥

अथ प्रासादमण्डने पञ्चमोऽध्यायः
मंगल—
नानाविधमिदं विश्वं विचित्रं येन सूत्रितम् ।
सूत्रधारः श्रेयसेऽस्तु¹ सर्वेषां पालनक्षमः ॥१॥
जिसने अनेक प्रकार का यह विचित्र जगत बनाया है, यही सूत्रधार (विश्वकर्मा)
सबका पालन करने मे समर्थ है। और यही सबके कल्याण के लिये हों ॥१॥
ग्रंथ मान्यता की याचना—
न्यूनाधिकं प्रसिद्धं च यत् किञ्चिन्मण्डनोदितम् ।
विश्वकर्मप्रसादेन शिल्पिभिर्मान्यतां वचः ॥२॥
जगत में जो कुछ मंडन सूत्रधार का न्यूनाधिक रूप से कहा हुआ शिल्पशास्त्र प्रसिद्ध है,
वह विश्वकर्मा की कृपा से शिल्पियो से मान्य हो ॥२॥
वैराज्यपासाद—
चतुर्भागं समारभ्य यावत्सूर्योत्तरं शतम् ।
भागसंख्येति विख्याता फालना कर्णबाह्यतः ॥३॥
चार भाग से लेकर एकसो बारह भाग तक के वैराज्यादि प्रासाद होते है । तथा उनकी
फालनाऐ कोने से बाहर निकलती होती है । ॥३॥
फालना के भेद—
अष्टोत्तरशतं भेदा अंशवृद्ध्या भवन्ति ते ।
समांशैर्विषमैः कार्या-नन्तभेदैश्च फालना ॥४॥
एक २ अंशकी वृद्धि से फालना का एक सौ आठ भेद होते हैं। एवं समांश और
विषमांश के भेदो से फालना के अनन्त भेद भी होते है ॥४॥
एकस्यापि तलस्योध्र्वे शिखराणि बहून्यपि ।
नामानि जातयस्तेषा-मूर्ध्वमार्गानुसारतः ॥५॥
एक ही तल के ऊपर बहुत प्रकार के शिखर बनाये जाते है और उन शिखरो के निर्माण
१. 'स एव स्यात्' ।

६६ | प्रासादमण्डने


से ही प्रासादों के नाम और उसकी जाति, ये दोनों उत्पन्न होते है ॥५॥
भ्रमणी (परिक्रमा)—
दशहस्तादधो न स्यात् प्रासादो भ्रमसंयुतः ।
नवाष्टदशभागेन भ्रमो भित्तिर्विधीयते ॥६॥
दस हाथ से न्यून प्रासाद को भ्रमणी (परिक्रमा) नहीं किया जाता, किन्तु दस हाथ से
अधिक विस्तार वाले प्रासाद को भ्रमणी करना चाहिये। भ्रमणी और दीवार प्रासाद के आठ
नव अथवा दसवें भाग की रखना चाहिये ॥६॥
१-वैराज्य प्रासाद—
वैराज्यश्चतुरस्रः स्याच्चतुद्वारे चतुष्किका ।
प्रासादो ब्रह्मणः प्रोक्तो निर्मितो विश्वकर्मणा ॥७॥
प्रथम वैराज्य प्रासाद समचोरस और चार द्वार वाला है।
प्रत्येक द्वार चौकी मंडप वाला बनावे। यह प्रासाद ब्रह्माजी ने कहा है
और विश्वकर्मा ने निर्माण किया है ॥७॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १५५ में कहा है कि—
“चतुरस्रीकृते क्षेत्रे तथा षोडशभाजिते ।
तस्य मध्यं चतुर्भागै-गर्भं सूत्रैश्च कारयेत् ॥
द्वादशस्वथ शेषेषु बाह्ये भित्तीः प्रकल्पयेत् ॥”
वैराज्य प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग कर के उन
में से चार भाग का मध्य गर्भगृह बनावे और बाकी बारह भाग में
दो २ भाग की दीवार और दो भागकी भ्रमणी बनावे ।
सपादं शिखरं कार्यं घण्टाकलशभूषितम् ।
चतुर्भिः शुकनासैस्तु सिंहकर्णैर्विराजितम् ॥८॥
इसके शिखर का उदय विस्तार से सवाया बनावे । तथा
आमलसार और कलश से सोभायमान करें। एवं चारों ही दिशा मे
शुकनाश तथा सिंहकर्ण आदि से शिखर को शोभायमान बनावे ॥८॥


रेखाचित्र विवरण (चित्रगत पाठ):

  • शिखर के पार्श्व में (उर्ध्व पाठ): वैराज्यादि प्रकृति प्रथम विभक्ति अंक ॥१॥
  • तलच्छन्द (Ground Plan) में अंकित पाठ: गर्भगृह, भित्ति, भ्रम, २, भित्ति

ओरीसा जगन्नाथपुरी का वैराज्यादि जाति का
एकाण्डक शिखर

i
नागर जाति के पासाद का कलामय मंडोवर (दीवार)
२

पञ्चमोऽध्यायः ६७
दिशा के द्वार का नियम—
एकद्वारं भवेत् पूर्वे द्विद्वारं पूर्वपश्चिमे ।
त्रिद्वारं मध्यजं द्वारं दक्षिणास्यं विवर्जयेत् ॥६॥
प्रासाद का यदि एक द्वार रखना हो तो पूर्वदिशा मे ही रक्खे। दो द्वार रखना हो तो
पूर्व पश्चिम दिशामे रक्खे। तीन द्वार रखना हो तो दो द्वार के बीच में मुख्य द्वार रक्खे।
परन्तु दक्षिणाभिमुख वाला मुख्य द्वार नहीं रखना चाहिये। ऐसा द्वार नहीं बनावें जिससे
प्रवेश मे उत्तर मुख रहे ॥६॥
चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु शिवब्रह्मजिनालये ।
होमशालायां २कर्त्तव्यं क्वचिद् राजगृहे तथा ॥१०॥
शिव, ब्रह्मा और जिनदेव, इनके प्रासादो मे चारो ही दिशाओ मे द्वार रक्खे जाते हैं।
एवं यज्ञशाला और कभी राजमहल मे भी चारो दिशाओ में द्वार रक्खे जाते है ॥१०॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १५७ मे त्रिद्वारके विषय मे विशेषरूप से लिखते है कि—
"पूर्वोत्तरयाम्ये चैव पूर्वापरोत्तरे तथा।
याम्यापरोत्तरे शस्तं त्रिद्वारं त्रिविधं स्मृतम् ॥"
पूर्व उत्तर और दक्षिण, पूर्व पश्चिम और उत्तर तथा दक्षिण पश्चिम और उत्तर, इस
प्रकार तीन प्रकार के त्रिद्वार प्रशस्त है।
"पूर्वापरे स्याद् द्विद्वारं दूषयेच्च याम्योत्तरे।
एकद्वारं च माहेन्द्रं चतुर्द्वारं चतुर्दिशम् ॥" अप० सू० १५७
प्रासाद मे दो द्वार बनाना हो तो पूर्व और पश्चिम दिशा में बनावें। परन्तु उत्तर और
दक्षिण दिशा मे नही बनावे, क्योकि यह दोष कर्त्ता है। यदि एक ही द्वार बनाना हो तो
पूर्व दिशा मे ही बनावे और चार द्वार बनाना हो तो चारों दिशा मे बनावे।
"पूर्वे च भक्तिदं द्वारं मुक्तिदं वरुणोद्गतम् ।
याम्योत्तरे शिवे द्वारे कृते दोषो महद्भयम् ॥" अप० सू० १५७
पूर्वदिशा का द्वार भक्ति देनेवाला है और पश्चिम दिशा का द्वार मुक्ति को देनेवाला है।
शिव प्रासाद मे यदि उत्तर और दक्षिण दिशा में द्वार किया जाय तो बडा दोष और भय
करने वाला है।
२. 'होमश ला चतुर्द्वारा' पाठान्तरे ।
प्रा० १३

“एकद्वारं च माहेन्द्र्या-मन्यथा दोषंदं भवेत् ।
भद्रं सर्वत्र कल्याणं चतुर्द्वारं शिवालये ॥” अप० सू० १५७
शिवालय मे एक द्वार रखना हो तो पूर्व दिशा में ही रखे और अन्य दिशा में रखें
तो दोष देने वाला है । परन्तु चारो दिशा में चार द्वार बनावें तो कल्याण कारक है ।
‘ब्रह्मविष्णुरवीणां च कुर्यात् पूर्वोक्तमेव हि ।
समोसरणे च जैनेन्द्रे दिशादोषो न विद्यते ॥’ अप० सू० १५७
ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन प्रासादों में ऊपर कहे अनुसार द्वार बनावें । जिनदेव के
समवसरण प्रासादों में दिशा का दोष नहीं है । चाहे जिस दिशा में द्वार बना सकते है ।
वैराज्यादिसमुत्पन्नाः प्रासादा ब्रह्मणोदिताः १ ।
एक-त्रि-पञ्चसप्ताङ्ग-संख्याङ्गैः पञ्चविंशतिः ॥११॥
इति वैराज्यप्रासादः ।
वैराज्यादि जो पचीस प्रासाद हैं, वे ब्रह्माजी ने बताये हैं । वे एक, तीन, पांच, सात
और नव अंगो के भेदवाले है ।
जैसे-वैराज्यप्रासाद एक अंग फक्त कोना वाला है । नंदन, सिंह और श्रीनन्दन, ये तीन
प्रासाद तीन अंग ( दो कोना और भद्र ) वाले हैं । मंदर, मलय, विमान, सुविशाल और
त्रैलोक्यभूषण, ये पांच प्रासाद पांच अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिरथ और भद्र ) वाले है । माहेन्द्र,
रत्नशीर्ष, शतशृंग, भूधर, भुवनमंडन त्रैलोक्यविजय और पृथ्वीवल्लभ,’ ये सात प्रासाद
सात अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिरथ, दो रथ और भद्र ) वाले है । महीधर, कैलाश, नवमंगल,
गंधमादन, सर्वाङ्गसुन्दर, विजयानन्द, सर्वाङ्गतिलक, महाभोग और मेरु, ये नव प्रासाद नव
अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिकर्ण दोरथ, दो उपरथ और भद्र ) वाले है । ऐसा अपराजित पृच्छा
सूत्र १५६ में कहा है ॥११॥
२-नन्दन प्रासाद—
चतुर्भक्ते भवेत् कोणो भागो भद्रं द्विभागिकम् ।
भागार्धं निर्गमं भद्रे प्रकुर्यान्मुखभद्रकम् ॥१२॥
शृङ्गमेकं भवेत् कोणे२ द्वे द्वे भद्रे च नन्दनः ।
इति नंदनः ।
प्रासाद के तल का चार भाग करे । उनमें से एक २ भाग का कोना और दो भाग का
भद्र बनावें । भद्र का निर्गम आधा भाग का रखें। भद्र में मुखभद्र भी बनावें । कोने के ऊपर
१. ब्रह्मणार्चिताः' २. 'कर्णे' ।

पञ्चमोऽध्यायः ६६
एक २ शृंग और भद्र के ऊपर दो २ उरुशृंग रक्खे । ऐसा नंदन नाम का प्रासाद है ॥१२॥
शृंगसंख्या १३ । कोणे ४ भद्रे ८ और एक शिखर ।
३-सिंहप्रासाद—
[चित्र विवरण: वैराग्यादि त्र्यङ्गो नन्दन प्रासाद भद्र १ भाग ४ अंक न. ३१॥ प्रासादपीठ प्र. ३१यते / नदन प्रासाद]
मुखभद्रे प्रतिभद्र-मुद्गमो रथिकोपरि ॥१३॥
कर्णशृङ्गे सिंहकर्णः सिंहनामा स उच्यते ।
देवतासु² प्रकर्त्तव्यः सिंहस्तत्रैव शाश्वतः ॥१४॥
तुष्यति गिरिजा तस्य सौभाग्यधनपुत्रदा ।
रथिका सिंहकर्णश्च भद्रे शृङ्गे च सिंहकः ॥१५॥
इति सिंहः ।
तल विभक्ति नन्दन प्रासाद की तरह ही करे । मुखभद्र में
प्रतिभद्र बनावे । तथा भद्र के गवाक्ष के ऊपर उद्गम बनावे । कोने
के शृंगो के ऊपर सिंह रक्खे । ऐसा सिंह नाम का प्रासाद है ।
यह देवता (देवीओँ) के लिये बनावे । इसमे सिंह शाश्वत रहता
है, इसलिये पार्वती देवी खुश होती है और सौभाग्य धन और
पुत्र देती है। भद्र की रथिका के ऊपर सिंहकर्ण और शृंगो के
ऊपर भी सिंहकर्ण रखने से सिंह नाम का प्रासाद है ॥१३ से १५॥
४-श्रीनन्दन प्रासाद—
कर्णे शृङ्गं तु पञ्चाण्डं स श्रीनन्दन उच्यते ।
इति नन्दनः इतित्र्यङ्गप्रासादाः ।
नन्दन प्रासाद के कोने ऊपर पाच अंडक वाला केसरी
शृंग चढ़ावे तो यह श्रीनन्दन नाम का प्रासाद होता है ।
शृङ्ग संख्या २६ । कोणे केसरी क्रम २०, भद्रे ८, एक शिखर ।
५-मंदिर और ६-मलय प्रासाद—
त्र्यङ्ग इत्यर्थः षड्भागै-श्चतुरस्रं विभजयेत् ॥१६॥
कर्णं प्रतिरथं कुर्याद् भद्रार्धं भागभागिकम् ।
समं निर्गममंशैश्च³ भद्रं, भागाद्द्वै निर्गमम् ॥१७॥
२. 'देवाना तु' । ३. 'निर्गममस्माच्च' ।

१०० प्रासादमण्डने
द्वे द्वे कर्णे तथा भद्रे शृङ्गमेकं प्रतिरथे ।
मन्दिरस्तृतीयं भद्रे मलयो भद्रजं त्यजेत् ॥१८॥
ऊपर तीन अंगवाले प्रासादो का वर्णन कहा गया है।
अब पांच अंगवाले प्रासादों का वर्णन करते हैं—समचोरस
प्रासाद के तलका छह भाग करें। इनमें कर्ण, प्रतिकर्ण और
भद्रार्ध, ये प्रत्येक एक २ भाग का रक्खे । कर्ण और प्रतिकर्ण का
निर्गम समदल रक्खें और भद्र का निर्गम आधा भाग रखना
चाहिये । कर्ण और भद्र के ऊपर दो दो और प्रतिकर्ण के ऊपर
एक २ शृङ्ग चढावें। ऐसा मंदिर नाम का प्रासाद है। इस
प्रासाद के भद्र के ऊपर तीसरा एक उरुशृंग चढ़ावें तो मलय
नाम का प्रासाद होता है ॥१६ से १८॥
शृंग सख्या २५ । कोणे ८, भद्रे ८, प्ररथे ८, एक शिखर ।
७-विमान, ८-विशाल और ९ त्रैलोक्यभूषण प्रासाद—
प्रत्यङ्गं तिलकं कुर्यात् प्रतिरथे विमानकः ।
भद्रोरुशृङ्गैर्वैश्शालः प्रतिरथे सुभूष्णः ॥१९॥
इति पञ्चांगाः पंचप्रासादाः ।
ऊपर श्लोक १८ के अंत मे 'भद्रजं त्यजेत्' शब्द का यहां
अर्थ करें। मलय नाम के प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरुशृंग
हटा करके कर्ण के दोनों तरफ एक २ प्रत्यंग चढावें और
प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें, तो इसे विमान नाम का
प्रासाद कहा जाता है। विमान प्रासाद के भद्र के ऊपर एक २
उरुशृंग अधिक चढावे, तो विशाल नाम का प्रासाद कहा
जाता है, और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढावे तो उसे त्रैलोक्यभूषण नामक
प्रासाद कहा है ॥१९॥
विमान शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ८, प्रत्यंग ८ एक शिखर एवं कुल ३३ शृंग ।
तिलक संख्या—प्ररथे १-१ कुल ८ । त्रैलोक्यभूषण शृंगसंख्या—कोणे ८ प्रतिरथे १६ भद्रे
८, प्रत्यंग ८, एक शिखर एवं ४१ शृंग और तिलक ८ । विशाल शृंगसंख्या—भद्रे १२ बाकी
पूर्ववत् कुल ३७ । तिलक ८ प्ररथे ।

पञ्चमोऽध्यायः १०१
१०-माहेन्द्रप्रासाद—
चतुरस्रेऽष्टभिर्भक्ते कर्णं प्रतिरथं रथम् ।
भद्रार्धं भागभागं च भागार्धेन विनिर्गमम् ॥२०॥
वारिमार्गान्तरयुक्ता रथाश्च तुल्यनिर्गमाः ।
शृङ्गयुग्मं च तिलकं कर्णे द्वेतु प्रतिरथे ॥२१॥
एकं चोपरथे भद्रे त्रीणि त्रीणि चतुर्दिशि ।
शिखरं पञ्चविस्तारं माहेन्द्रो राज्यदो नृणाम् ॥२२॥
इति माहेन्द्रः ।
समचोरस तल का आठ भाग करे। इनमे कर्ण, प्रतिरथ, उपरथ और भद्रार्ध, ये प्रत्येक
एक १ भाग का रखें। भद्रका निर्गम आधा भाग का रखे
ये सब अंग वारिमार्ग वाले बनावें । कर्ण, प्रतिरथ और उपरथ
का निर्गम एक १ भाग रखें। कर्णके ऊपर दो २ शृंग और
एक तिलक चढावें, प्रतिरथ के ऊपर दो २ शृंग, उपरथ के ऊपर
एक १ शृंग और भद्र के ऊपर तीन ३ उरुशृंग चढावे। मूल
शिखर का विस्तार पाच भाग रखे। ऐसा माहेन्द्र नाम का
प्रासाद मनुष्यो को राज्य देनेवाला है ॥२० से २२॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे १६ उपरथे ८, भद्रे १२
एक शिखर एवं कुल ४५, तिलक, ४ कोणे ।
११-रत्नशीर्ष प्रासाद—
कर्णे शृङ्गत्रयं शेषं पूर्ववद् रत्नशीर्षकः ।
इति रत्नशीर्षः ।
माहेन्द्र प्रासाद के कर्णके ऊपर यदि तीन शृंग चढ़ाया
जाय तो उस प्रासाद का नाम रत्नशीर्ष होता है ।
शृंग संख्या—कोणे १२, प्ररथे १६, उपरथे ८ भद्रे १२
एक शिखर, कुल ४९ ।
१२-सितशृंग प्रासाद—
त्यक्त्वैकशृङ्गं भद्रस्य मत्तालम्बं च कारयेत् ॥२३॥


चित्र-विवरण (Diagram Inscriptions):

[शिखर-पार्श्वे ऊर्ध्व-पंक्तिः]: चौथादि शंगती माहेन्द्र प्रासाद तलशृंग ४८॥ अंक ॥६४॥ शिखर ४५॥
[पीठिका-योजनान्तर्गतम्]: गर्भ गृह / ३+३
[पीठिका-पार्श्वे]: पृष्ठभद्र और भद्रार्ध
[चित्राधोभागे]: माहेन्द्र प्रासाद

३. अध्याय ७-१०: शिखर-निर्माण, उरुशृङ्ग, आमलक एवं कलश-स्थापन

१०२ प्रासादमण्डने
मस्तके तस्य छाद्यस्य शृङ्गयुग्मं प्रदापयेत् ।
सितशृङ्गस्तदा नाम ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥२४॥
रत्नशीर्ष प्रासाद के भद्र के तीन उरुशृंगों मे से एक कम करके उस स्थान पर मत्तालम्ब
( गवाक्ष ) बनावें और उसके छाद्य के ऊपर दो शृंग चढ़ावें । ऐसा सितशृंग नाम का प्रसाद
ईश्वर को हमेशा प्रिय है ॥२४॥
शृंग संख्या—कोणे १२, प्ररथे १६, उपरथे ८ भद्रे १६ एक शिखर, कुल ५३
१३-भूधर और १४-भुवनमंडन प्रासाद—
तिलकं यद्युपरथे भूधरो नाम नामतः ।
छाद्यशृङ्गे तु तिलकं नाम्ना भुवनमण्डनः ॥२५॥
सितशृंग प्रासाद के उपरथ ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे, तो भूधर नाम का प्रासाद होता
है और छाद्य के दोनों शृङ्गों के ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे तो भुवनमंडन नाम का प्रासाद
होता है ॥२५॥
१५-त्रैलोक्यविजय और १६-क्षितिवल्लभ प्रासाद--
शृङ्गद्वयं चोपरथे तिलकं कारयेत् सुधीः ।
त्रैलोक्यविजयो भद्रं शृङ्गेण क्षितिवल्लभः ॥२६॥
इति सप्ताङ्गाः सप्तप्रासादाः ।
यदि उपरथ के ऊपर दो शृंग और एक तिलक किया जाय तो त्रैलोक्यविजय नामका
प्रासाद होता है और भद्र के ऊपर एक शृंग अधिक चढ़ाया जाय तो क्षितिवल्लभ नाम का
प्रासाद होता है ॥२६॥
शृंगसंख्या—कोणे १२, प्ररथे १६ उपरथे १६- भद्रे १२ एक शिखर कुल ५७, तिलक ८
१७-महीधर प्रासाद--
दशभागकृते क्षेत्रे भद्रार्धं भागमानतः ।
त्रयः प्रतिरथाः कर्णो भागभागाः समो भवेत् ॥२७॥
कर्णे प्रतिरथे भद्रे द्वे द्वे शृङ्गे प्रकारयेत् ।
रथोपरथे तिलकं ग्रन्यङ्गं च रथोपरि ॥२८॥
मत्तालम्बयुतं भद्रं प्रासादोऽयं महीधरः ।

पञ्चमोऽध्यायः १०३
समचोरस प्रासाद के तलका दस भाग करे । उनमें भद्रार्ध, कर्ण प्रतिकर्ण, रथ और
उपरथ ये प्रत्येक एक २ भाग का बनावें और इनका निर्गम भी एक २ भाग का रखें । भद्र का
निर्गम आधे भाग का रखें । कोना, प्रतिरथ और भद्र के ऊपर दो २ शृंग तथा रथ और
उपरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें । एवं रथ के ऊपर प्रत्यंग चढावे । भद्र मत्तालंब
( गवाक्ष ) वाला बनावें । ऐसा महीधर नाम का प्रासाद है ॥२७-२८॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे ८, प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ४१ । तिलक-
रथे ८, उपरथे ८
१८-कैलास प्रासादः—
भद्रे शृङ्गं तृतीयं च कैलासः १ शङ्करप्रियः ॥२६॥
महीधर प्रासाद के भद्र के ऊपर तीसरा एक शृंग अधिक
चढावे तो कैलाश नाम का प्रासाद होता है। यह शंकर को
प्रिय है ॥२६॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे १२, प्रत्यंग ८ एक
शिखर कुल ४५ । तिलक-रथे ८ उपरथे ८
१६-नव मंगल और २०-गंधमादन प्रासाद—
भद्रे त्यक्त्वा रथे शृङ्गं नवमङ्गल उच्यते ।
तथा भद्रे पुनर्द्दद्यात् तदासौ गन्धमादनः ॥३०॥
कैलाश प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक ऊरुशृंग कम
करके रथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावे तो नवमंगल नामका
प्रासाद होता है। यह नवमंगल प्रासाद के भद्र के ऊपर एक
ऊरुशृंग अधिक चढावे तो गंधमादन नाम का प्रासाद
होता है ॥३०॥
शृंगसंख्या-४१ । कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे ८, रथे ८,
प्रत्यंग ८, एक शिखर । तिलक ८ उपरथे
२१- सर्वाङ्गसुन्दर और २२- विजयानन्द प्रासाद—
भद्रे त्यक्त्वा चोपरथे शृङ्गं सर्वाङ्गसुन्दरः ।
भद्रे दद्यात् पुनः शृङ्गं विजयानन्द उच्यते ॥३१॥
१. 'नाम नामतः' ।

१०४ प्रासादमण्डने
गंधमादन प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरःशृंग कम करके उपरथ के ऊपर एक २
शृंग चढ़ावें, तो सर्वांगसुन्दर नाम का प्रासाद होता है। इसके भद्रके ऊपर एक २ उरःशृंग
फिर चढ़ावे तो विजयानन्द नामका प्रासाद होता है ॥३१॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६, रथे ८, भद्रे ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ५७
२३-सर्वांगतिलक प्रासाद-
मत्तालंवयुतं भद्र-मुरुशृङ्गं परित्यजेत् ।
शृङ्गद्वयं च छाद्योर्ध्वे सर्वांगतिलकस्तथा ॥३२॥
विजयानंद प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक २ उरुशृंग कम कर के मत्तालंब (गवाक्ष)
बनावें और इस गवाक्ष के छाद्य के ऊपर दो शृंग रक्खें, तो सर्वांग तिलक नाम का प्रासाद
होजाता है ॥३२॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६ रथे ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, भद्रे और गवाक्षे १६,
एक शिखर कुल ६५ शृंग
२४-महाभोग प्रासाद-
उरुशृङ्गं ततो दद्यान्मत्तालम्बसमन्वितम् ।
महाभोगस्तदा नाम सर्वकामफलप्रदः ॥३३॥
सर्वांग तिलक प्रासाद के गवाक्ष वाले भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चढ़ाने से
महाभोग नाम का प्रासाद होता है। यह सब कार्य के फल को देने वाला है ॥३३॥
२५-मेरुप्रासाद-
कर्णे रथे प्रतिरथे शृङ्गमुपरथे तथा ।
मेरुरेष समाख्यातः सर्वदेवेषु पूजितः ॥३४
इति नवाङ्गा नवप्रासादाः ।
कर्ण, रथ, प्रतिरथ और उपरथ इन सबके ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ावे तो मेरु
नामक प्रासाद होता है, यह सब देवों में पूजनीय है ॥३४॥
प्रासादप्रदक्षिणा का फल--
'प्रदक्षिणात्रयं कार्यं मेरुप्रदक्षिणायतम् ।
फलं स्याच्छैलराज्यस्य मेरोः प्रदक्षिणाकृते ॥३५॥
१. 'प्रदक्षिणात्रये स्वर्गं-मेरौ पुंसां च यत्फलम् ।
इष्टकाशैलजे मेरौ तत्फलं प्रदक्षिणाकृते ॥' इति पाठान्तरे ।

पञ्चमोऽध्यायः १०५
सुवर्ण के मेरु पर्वत की तीन प्रदक्षिणा करने से जो फल होता है, उतना फल इस पाषाण
के बने हुये मेरुप्रसाद की तीन प्रदक्षिणा करने से होता है ॥३५॥
वैराज्यप्रमुखास्तत्र नागरा ब्रह्मणोदिताः ।
वल्लभाः सर्वदेवानां शिवस्यापि विशेषतः ॥३६॥
इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे वैराज्यादिप्रासाद-
पञ्चविंशत्यधिकारनाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥*
वैराज्यादि यह पचीस प्रासाद नागर जाति के है। ये स्वयं ब्रह्माजी के कहे हुए है।
इसलिए ये प्रासाद सब देवो के लिये प्रिय है। उनमे भी महादेवजी तो विशेष प्रिय है ॥३६॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासाद मण्डनके वैराज्यादी प्रासाद
नामके पांचवे अध्यायकी सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता।
*विशेष जानने के लिये देखें अपराजितपृच्छा सूत्र-१५७
प्रा० १४

अथ प्रासादमण्डने षष्ठोऽध्यायः
केसरी आदि पचीसप्रासादों के नाम—
केसरी सर्वतोभद्रो नन्दनो १नन्दशालिकः ।
नन्दीशो २मन्दरश्चैव ३श्रीवृक्षश्चामृतोद्भवः ॥१॥
हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः ।
इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥२॥
वैडूर्यः पद्मरागश्च वज्रको मुकुटोज्ज्वलः ।
ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभध्वजः ॥३॥
मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः ।
ब्रह्मविष्णुशिवाकार्णा—मन्येषां न कदाचन ॥४॥
केसरो १, सर्वतोभद्र २, नन्दन ३, नन्दशालिक ४, नन्दीश ५, मन्दर ६, श्रीवृक्ष ७,
अमृतोद्भव ८, हिमवान ९, हेमकूट १०, कैलाश ११, पृथिवीजय १२, इन्द्रनील १३, महा-
नील १४, भूधर १५, रत्नकूटक १६, वैडूर्य १७, पद्मराग १८, वज्रक १६, मुकुटोज्ज्वल १०,
ऐरावत २१, राजहंस २२, गरुड २३, वृषभध्वज २४, और-मेरु २५, ये प्रासादों के पचीस
नाम हैं। मेरु प्रासाद सब प्रासादों का राजा है और उसमें देवोंका निवास भी है, इसलिए यह
मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य, इन देवों के लिए बनाना चाहिये, परन्तु दूसरे
देवों के लिये यह नहीं बनाना चाहिये ॥१ से ४॥
पचीस प्रासादों की शृंग संख्या—
आद्यः पञ्चाण्डको ज्ञेयः केसरीनाम नामतः ।
४तावदन्तं चतुर्वृद्धि-र्यावदेकोत्तरं शतम् ॥५॥
प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृंगवाला है। (चार कोने पर चार और एक मुख्य
शिखर इस प्रकार पांच) । अंतिम प्रासाद तक प्रत्येक प्रासाद के ऊपर अनुक्रमसे चार २ शृंग
बढानेसे पच्चीसवें मेरु प्रासादके ऊपर एक सौ एक शृंग होते हैं ॥५॥
१. 'नन्दिशालकः' । २. 'मन्दिर' । ३. 'श्रीवत्स' । ४. 'चतुर्णां क्रमतो वृद्धिः' ।

षष्ठोऽध्यायः १०७
अष्टविभागीय तलमान—
क्षेत्रेऽष्टांशैर्विभक्ते तु कर्णौ भागद्वयं भवेत् ।
भद्रार्धं कर्णतुल्यं तु भागेनैकेन निर्गमः ॥६॥
समचोरस प्रासाद के तलका आठ भाग करें, उनमे से दो भाग का कोना और दो भाग
का भद्रार्ध बनावें। इन अंगों का निर्गम एक २ भाग का रक्खे ॥६॥
दश और बारह विभागीय तलमान--
दशांशे सार्धभागं च भद्रार्धं च प्रतिरथः ।
कर्णौ द्विभागः सूर्यांशे भद्रार्धं च प्रतिरथः ॥७॥
समचोरस तलका दस भाग करें। उनमे से दो भाग का कोना, डेढ़ भाग का प्रतिरथ
और डेढ़ भाग का भद्रार्ध बनावे। यदि बारह भाग करना हो तो दो भाग का कर्ण, दो भाग का
प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध बनावे ॥७॥
चौदह विभागीय तलमान—
चतुर्दशविभक्ते तु कर्णाद्यं द्वादशांशवत् ।
भद्रपार्श्वद्वये कार्या भागभागेन नन्दिका ॥८॥
समचोरस तलका चौदह भाग करे । उनमे से कर्ण आदिका मान बारह विभागीय
तलमान के अनुसार रक्खें । अर्थात् कर्ण दो भाग, प्रतिकर्ण दो भाग, और भद्रार्ध दो भाग,
ऐसे बारह भाग और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की नन्दिका ( कोणी ) बनावे । ऐसे
कुल चौदह भाग होते है ॥८॥
सोलह विभागीय तलमान—
षोडशांशे प्रकर्त्तव्या कर्णप्रतिरथान्तरे ।
कोशिका भागतुल्या च शेषं चतुर्दशांशवत् ॥६॥
समचोरस तलका सोलह भाग करे । उनमे से कर्ण और प्रतिरथ के बीचमे एक २ भाग
की कोशिका बनावें । बाकी सब अंगो का मान चौदह विभागीय तलमान के बराबर समझे ।
अर्थात् कर्ण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, नंदी एक भाग और भद्रार्ध दो भाग,
इस प्रकार सोलह विभागीय तलमान होता है ॥६॥

१०८ प्रासादमण्डने
अठारह विभागीय तलमान--
अष्टादशांशे भद्रस्य पार्श्वे द्वे द्वे च नन्दिके ।
कर्त्तव्ये भागभागेन शेषं स्यात् षोडशांशवत् ॥१०॥
समचोरस तलका अठारह भाग करें। उनमें से भद्र के दोनों तरफ दो २ नन्दी एक २
भाग की बनावें । बाको सब सोलह विभागीय तलमान के बराबर जानें । जैसे—कर्ण दो भाग,
कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, नन्दी एक भाग, दूसरी नंदी एक भाग और भद्रार्ध दो
भाग, ऐसे अठारह भागीय तलमान जानें ॥१०॥
बीस विभागीय तलमान--
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशत्यंशविभाजिते ।
कर्णौ द्विभागो नन्दिका सार्धांशा पृथुविस्तरे ॥११॥
द्विभागस्तु प्रतिरथो नन्दिका सार्धभागिका ।
भद्रनन्दी भवेद् भागा भद्रार्धं युग्मभागिकम् ॥१२॥
समचोरस क्षेत्र के बीस भाग करें। उनमे से दो भाग का कर्ण, डेढ़ भाग की कोणी,
दो भाग का प्रतिरथ, डेढ़ भाग की नंदिका, एक भाग की भद्रनंदी और दो भाग-का भद्रार्ध,
इस प्रकार बीस भागीय तलमान बनावें ॥११-१२॥
बाईस विभागीय तलमान--
द्वाविंशतिकृते१ क्षेत्रे नन्द्ये का भद्रपार्श्वयोः ।
त्रयः प्रतिरथाः कर्णौ भद्रार्धं च द्वि भागिकम् ॥१३॥
समचोरस क्षेत्र के बाईस भाग करें। उनमे से भद्र के दोनों तरफ की नन्दी एक २ भाग
की बनावे । बाकी तीन प्रतिरथ ( रथ, उपरथ और प्रतिरथ ) कर्ण और भद्रार्ध, ये प्रत्येक दो २
भाग का रखे । इस प्रकार बाईस विभागीय तलमान होता है ॥१३॥
तलोंके क्रमसे प्रासाद संख्या--
एकद्वित्रित्रिकं त्रीणि वेदाश्चत्वारि पञ्च च ।
तलेषु क्रमतोऽष्टासु केऽप्याहुः शिखराणि हि ॥१४॥
१. 'द्वाविंशत्यंशके नन्दी भागैका' ।

षष्ठोऽध्यायः १०६
केसरी आदि प्रासादो की तल विभक्ति आठ है। उनमें क्रमशः एक, दो, तीन, तीन, तीन,
चार, चार और पाच प्रासाद है। अर्थात् आठ तल वाला प्रथम एक प्रासाद; दस तल का दूसरा और
तीसरा ये दो; बारह तल का चौथा, पाचवां और छट्ठा ये तीन प्रासाद; चौदह तल का सातवां,
आठवां और नवां ये तीन प्रासाद; सोलह तलका दसवां, ग्यारहवां और बारहवा ये तीन
प्रासाद, अठारह तलका तेरहवां, चौदहवां, पद्रहवां और सोलहवां ये चार प्रासाद; बीस तलका
सत्रहवां, अठारहवां, उन्नीसवां और बीसवा ये चार प्रासाद और बाईस तलका इक्कीस से
पच्चीस तक के पांच प्रासाद हैं। ऐसा किसी (क्षीरार्णव) का मत है ॥१४॥
शिखरं त्वेकवेदैकं षट्त्रिवेदयुगद्वयम् ।
तलेषु क्रमशः प्रोक्तो मूलसूत्रेऽपराजिते ॥१५॥
केसरी प्रासादों मे प्रथम आठ तलका, दोसे पांच ये चार प्रासाद दस तलका, छट्ठा
एक प्रासाद बारह तलका, सात से बारह ये छः प्रासाद चौदह तलका, १३ से १५ ये तीन
प्रासाद सोलह तलका, १६ से १९ ये चार प्रासाद अठारह तलका, २० से २३ ये चार प्रासाद
बीस तलका और चौबीसवां और पच्चीसवा ये दो प्रासाद बाईस तलका होता है। यह मूलसूत्र
अपराजितपृच्छा का मत है ॥१५॥
तलेष्वष्टासु विहिताः प्रासादाः पञ्चविंशतिः ।
त्रयस्त्रयः क्रमेणैव चत्वारस्त्वष्टमे तले ॥१६॥
केसरी आदि पच्चीस प्रासादों की जो आठ तल विभक्ति हैं, उनमें प्रत्येक तल के तीन २
प्रासाद है और आठवा बाईस विभागीय तल के चार प्रासाद है ॥१६॥
त्रीणि त्रीणि स्वकीयानि द्वे द्वे परः परस्य च ।
शिखराणि विधेयानि विश्वकर्मवचो यथा ॥१७॥
ऊपर १६ वे श्लोक मे तलो के तीन २ प्रासाद बनाने की जो बात कही गई है। यह मेरा
स्वयं (मंडन) का मत है और नीचे के श्लोक १८ वे मे दो दो आदि प्रासाद लिखा है, यह
दूसरे का मत है। ये पच्चीस प्रासाद विश्वकर्मा के वचन के अनुसार बनाये हैं ॥१७॥
'द्विद्वये कपट्त्रयोऽष्टादि-तलेषु पञ्चसु क्रमात् ।
सप्तैव सप्तमे षष्ठे शिरांसि त्रीणि चाष्टमे ॥१८॥
१. 'द्विद्व्येक'

११० प्रासादमण्डने
आठ तल विभक्तियों में से पहले पांच तल विभक्ति के अनुक्रम से दो, दो, एक, छह और
तीन प्रासाद हैं। छठी तल विभक्ति का एक प्रासाद, सातवीं तल विभक्ति के सात और
आठवीं तल विभक्ति के तीन प्रासाद हैं ॥१८॥
भेदाः पञ्चाशदेकैकं प्रोक्ताः श्रीविश्वकर्मणा ।
तेनैकस्मिंस्तलेऽपि स्युः शिखराणि बहून्यपि ॥१९॥
केशरी आदि प्रत्येक प्रासाद के पचास २ भेद श्री विश्वकर्माजी ने किये हैं। एकही प्रासाद
तल के ऊपर अनेक प्रकार के शिखर बनाये जाते हैं ॥१९॥
रथिकां सिंहकर्णं च भद्रे कुर्याद् गवाक्षकान् ।
प्रत्यङ्गैस्तिलकाद्यैश्च शोभितं सुरमन्दिरम् ॥२०॥
रथिका, सिंहकर्ण, भद्र में गवाक्ष, प्रत्यंग और तिलक आदि आभूषणों से देवालय को
सुशोभित बनावें ॥२०॥
प्रासादाः केसरीमुख्याः सर्वदेवेषु पूजिताः ।
पुरराज्ञः प्रजादीनां कर्तुः कल्याणकारिकाः ॥२१॥
इति केसर्यादिप्रासादाः पञ्चविंशतिः ।
केशरी आदि जो पच्चीस प्रासाद हैं, वे सब देवों के लिये पूजित हैं। इसलिये बनानेवाले
तथा नगर के राजा और प्रजा का कल्याण करने वाले हैं ॥२१॥
निरंधार प्रसाद—
षट्त्रिंशत्करतोऽधस्ताद् यावद्धस्तचतुष्टयम् ।
विना भ्रमैर्निरन्धाराः कर्त्तव्याः शान्तिमिच्छता ॥२२॥
छत्तीश हाथ से न्यून चार हाथ तक, अर्थात् चार हाथ से लेकर छत्तीस हाथ तक के
विस्तार वाले प्रासाद शान्ति को चाहने वाले शिल्पी भ्रम (परिक्रमा) बिनाके निरंधार
(प्रकार वाले) भी बना सकता है। निरंधार प्रासादको परिक्रमा नहीं बनावें ॥२२॥
प्रासादतलाकृतिः—
वास्तोः पञ्चविधं क्षेत्रं चतुरस्रं तथायतम् ।
वृत्तं वृत्तायतं चैवाष्टास्रं१ देवालयादिषु ॥२३॥
१. अष्टास्रं देवालयादनु ।

षष्ठोऽध्यायः १११
चौरस, लंब चौरस, गोल, लंबगोल और आठ कोना वाला, इस प्रकार पांच आकार के
देवालय आदि के वास्तुक्षेत्र हैं ॥२३॥
लम्बचोरस प्रासाद—
विस्तारे तु चतुर्भाग-मायामे पञ्चभागिकम् ।
ऊर्ध्वं त्रिकलशान् कुर्यात् पृष्ठाग्रे सिंहकर्णकम् ॥२४॥
लंब चौरस प्रासाद के विस्तार में चार भाग और लंबाई मे पांच भाग करना चाहिये
और उसके छाद्य के ऊपर तीन गुम्बद (कलश) रखना चाहिये। तथा आगे और पीछे के
चारों कोने पर सिंह रखना चाहिये।
गोल, लंबगोल और अष्टास्र प्रासाद—
वृत्तायतं च कर्त्तव्यं व्यासार्धं वामदक्षिणे ।
कर्णान्तं च भ्रामयेद् वृत्तं २भद्राणि चाष्टकोणिका ॥२५॥
प्रासादो वर्तुलोऽष्टास्रः प्रायेणैकाण्डकः शुभः ।
कर्णे वा श्रेणयोऽण्डानां मण्डपं तत्स्वरूपकम् ॥२६॥
इति पंचक्षेत्राणि ।
गोल प्रासाद के विस्तार का आधा भाग गोल के दोनो तरफ बढ़ावे तो लंबगोल प्रासाद
होता है। तलके मध्यबिंदु से कोने तक व्यासार्ध मान करके एक गोल खींचा जाय तो गोल-
प्रासादतल होता है। चौरस प्रासाद के चार भद्रो में कोना बनाया जाय तो अष्टास्र प्रासाद
होता है। गोल और अष्टास्र प्रासाद प्रायः करके एक शिखर वाला बनाना शुभ है। अथवा
शिखर के कोने मे शृंगो की पंक्ति रखनी चाहिये। इन प्रासादों का मंडप भी इसी स्वरूप का
बनाना चाहिये ॥२५-२६॥
नागर प्रासाद—
विविधै रूपसङ्घाटै-र्भद्रैर्गवाक्षभूषितैः ।
वितानफालनाभृङ्गै-रनेकैकैर्नागरा मताः ॥२७॥
अनेक प्रकार के तलाकृति वाले रूपों से, गवाक्ष वाले भद्रों से तथा अनेक प्रकार के
गुम्बदो से और अनेक शृंगयुक्त फालनाओं से शोभायमान नागर जाति का प्रासाद बनाया
जाता है ॥२७॥
२. वृत्ते भद्राणि चाष्ट हि ।