प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ प्रासादमण्डने षष्ठोऽध्यायः
केसरी आदि पचीसप्रासादों के नाम—
केसरी सर्वतोभद्रो नन्दनो १नन्दशालिकः ।
नन्दीशो २मन्दरश्चैव ३श्रीवृक्षश्चामृतोद्भवः ॥१॥
हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः ।
इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥२॥
वैडूर्यः पद्मरागश्च वज्रको मुकुटोज्ज्वलः ।
ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभध्वजः ॥३॥
मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः ।
ब्रह्मविष्णुशिवाकार्णा—मन्येषां न कदाचन ॥४॥
केसरो १, सर्वतोभद्र २, नन्दन ३, नन्दशालिक ४, नन्दीश ५, मन्दर ६, श्रीवृक्ष ७,
अमृतोद्भव ८, हिमवान ९, हेमकूट १०, कैलाश ११, पृथिवीजय १२, इन्द्रनील १३, महा-
नील १४, भूधर १५, रत्नकूटक १६, वैडूर्य १७, पद्मराग १८, वज्रक १६, मुकुटोज्ज्वल १०,
ऐरावत २१, राजहंस २२, गरुड २३, वृषभध्वज २४, और-मेरु २५, ये प्रासादों के पचीस
नाम हैं। मेरु प्रासाद सब प्रासादों का राजा है और उसमें देवोंका निवास भी है, इसलिए यह
मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य, इन देवों के लिए बनाना चाहिये, परन्तु दूसरे
देवों के लिये यह नहीं बनाना चाहिये ॥१ से ४॥
पचीस प्रासादों की शृंग संख्या—
आद्यः पञ्चाण्डको ज्ञेयः केसरीनाम नामतः ।
४तावदन्तं चतुर्वृद्धि-र्यावदेकोत्तरं शतम् ॥५॥
प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृंगवाला है। (चार कोने पर चार और एक मुख्य
शिखर इस प्रकार पांच) । अंतिम प्रासाद तक प्रत्येक प्रासाद के ऊपर अनुक्रमसे चार २ शृंग
बढानेसे पच्चीसवें मेरु प्रासादके ऊपर एक सौ एक शृंग होते हैं ॥५॥
१. 'नन्दिशालकः' । २. 'मन्दिर' । ३. 'श्रीवत्स' । ४. 'चतुर्णां क्रमतो वृद्धिः' ।