सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 86 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

अनुग्रह
आश्रितमात्रं पुरुषं स्वाभिमुखं कर्षति श्रीशः ।
लोहमपि चुम्बकाश्मा सम्मुखमात्रं जडं यद्वत् ॥२५१॥
भगवान् श्रीपति अपने आश्रितमात्र पुरुषको अपनी ओर
इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे सामने आये हुए जड लोहेको
चुम्बक खींच लेता है ।
अयमुत्तमोऽयमघमो जात्या रूपेण सम्पदा वयसा ।
श्लाघ्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेत्ति भगवाननुग्रहावसरे ॥
भगवान् कृपा करते समय यह नहीं देखते कि जाति, रूप,
सम्पत्ति और अवस्थाके विचारसे अमुक पुरुष तो उत्तम है और
अमुक अधम ।
अन्तःस्थभावभोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः ।
खदिरश्चम्पक इव वा प्रवर्षणं किं विचारयति ॥२५३॥
यह अन्तर्यामी परमात्मारूप महामेघ पुरुषके आन्तरिक
भावका ही भोक्ता है । वर्षाके समय मेघ यह कब विचारता है कि
यह तो खदिर (खैर) है और यह चम्पा है ।
यद्यपि सर्वत्र समस्तथापि नृहरिस्तथाप्येते ।
भक्ताः परमानन्दे रमन्ति सदयावलोकेन ॥२५४॥
यद्यपि भगवान् सर्वत्र समान हैं तथापि वे नृहरि (मनुष्यरूप
हरि) भी हैं; तथा ये भक्तजन उनकी दयामयी दृष्टिसे नित्य
परमानन्दमें मग्न रहते हैं ।
७३