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सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 86 में से

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पृष्ठ 72

प्रबोधसुधाकर
उपनिषदोंने भी मच्छरसे लेकर हाथीपर्यन्त त्रिलोकीके
समस्त जीवोंमें भगवान्‌की समता साक्षात् बतायी है ।
आत्मा तावदभोक्ता तथैव ननु वासुदेवश्चेत् ।
नानाकैतव्यनैः पररमणीभिः कथं रमते ॥२१८॥
शंका—आत्मा तो अभोक्ता है; यदि वासुदेव भी साक्षात्
आत्मा ही हैं तो उन्होंने नाना प्रकारके छल-छन्दोंसे पर-स्त्रियोंके
साथ रमण क्यों किया ?
सुन्दरमभिनवरूपं कृष्णं दृष्ट्वा विमोहिता गोप्यः ।
तमभिलषन्त्यो मनसा कामाद्विरहव्यथां प्रापुः ॥२१९॥
समाधान—उन अति मनोहर, अभिनवरूप श्रीकृष्णचन्द्र-
को देखकर मोहित हुई गोपियाँ ही उनकी मन-ही-मन इच्छा
करती थीं और [ उनके न मिलनेपर ] कामातुरा होकर अत्यन्त
विरहाकुला हो जाती थीं ।
गच्छन्त्यस्तिष्ठन्त्यो गृहकृत्यपराश्च भुञ्जानाः ।
कृष्णं विनान्यविषयं समक्षमपि जातु नाविन्दन्।२२०।
चलते-फिरते, उठते-बैठते, घरके कामोंको करते तथा
भोजनादि करते हुए हर समय श्रीकृष्णचन्द्रके अतिरिक्त उन्हें
सामने पड़ी हुई भी कोई वस्तु दिखायी नहीं देती थी । [ उन्हें
सभी पदार्थ श्रीकृष्णमय प्रतोत होते थे । ]
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