प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंसगुण-निर्गुणकी एकता
शंका—आत्मासे तो इन समस्त जीवोंकी उत्पत्ति हुई है
और संसारमें सबसे अधिक प्रिय भी आत्मा ही है, किन्तु श्री-
कृष्णचन्द्रमें यह बात नहीं मिल सकती ।
वत्साहरणावसरे पृथग्वयोरूपवासनाभूषान् ।
हरिरजमोहं कर्तुं स वत्सगोपान्विनिर्ममे स्वस्मात्॥२०७॥
समाधान—बछड़ोंको चुरा लेनेके समय ब्रह्माको मोहित
करनेके लिये भगवान्ने पृथक्-पृथक् अवस्था, रूप, वासनाओं और
भूषणोंसे युक्त गोप और बछड़ोंको अपने आपसे ही बना लिया था ।
अग्नेर्यथा स्फुलिङ्गाः क्षुद्रास्तु व्युच्चरन्तीति ।
श्रुत्यर्थं दर्शयितुं स्वतनोरतनोत्स जीवसन्दोहम्॥२०८॥
'जिस प्रकार अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं
उसी प्रकार आत्मासे विविध प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है'—इस
श्रुतिके अर्थको सिद्ध करनेके लिये ही भगवान्ने अपने शरीरसे
उस जीव-समूहको रचा था ।
यमुनातीरनिकुञ्जे कदाचिदपि वत्सकांश्च चारयति ।
कृष्णे तथार्यगोपेषु च वरगोष्ठेषु चारयत्स्वारात् ॥२०९॥
वत्सं निरीक्ष्य दूराद्गावः स्नेहेन सम्भ्रान्ताः ।
तदभिमुखं धावन्त्यः प्रययुर्गोपैश्च दुर्वाराः ॥२१०॥
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