प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 49, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वप्रकाशता
चक्षुर्द्वारैव स्यात्परात्मना भानमेतेषाम् ।
यद्वा तेऽपि पदार्था न ज्ञायन्तेऽथ केवलालोकात् ॥ १४०॥
तत्राप्यक्षिद्वारा सहायभूतो न चेदात्मा ।
नो चेत्सत्यालोके पश्यत्यन्धः कथं नार्थान् ॥ १४१॥
तथा इनका भान भी चक्षु-इन्द्रियद्वारा परमात्मासे ही होता
है । अथवा यों कहो कि यदि नेत्रेन्द्रियद्वारा आत्मा सहायक न
होता तो केवल प्रकाशसे ही इन पदार्थोंका भी ज्ञान नहीं हो
सकता था । यदि हो सकता तो प्रकाशके रहते हुए भी अन्धा
पुरुष पदार्थोंको क्यों नहीं देख लेता ?
सत्यात्मन्यपि किं नो ज्ञानं तच्चेन्द्रियान्तरेण स्यात् ।
अन्धे दृक्प्रतिबन्धे करसम्बन्धे पदार्थभानं हि ॥ १४२॥
यदि कहो कि आत्माके रहते हुए [ नेत्रेन्द्रियके अभावमें
भी ] अन्धे मनुष्यको पदार्थका ज्ञान क्यों नहीं होता ? सो उसे
अन्य इन्द्रियोंसे ज्ञान होता ही है, क्योंकि अन्धे मनुष्यको नेत्र बन्द
होनेपर भी हाथसे छूकर पदार्थका ज्ञान हो ही जाता है ।
जानाति येन सर्वं केन च तं वा विजानीयात् ।
इत्युपनिषदामुक्तिर्बुद्ध्यत आत्मात्मना तस्मात् ॥ १४३॥
उपनिषदोंका कथन है कि 'जिसके द्वारा सब कुछ जाना
जाता है उस ( आत्मा ) को किससे जाने ?' अतः आत्मा तो
आत्मासे ही जाना जाता है ।
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