सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 86 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

प्रबोधसुधाकर
गुडखण्डशर्कराद्या भिन्नाः स्युर्विकृतयो यथैकेक्षोः ।
केयूरकङ्कणाद्या यथैकहेम्नो भिदाश्च पृथक् ॥१२९॥
एवं पृथक्स्वभावं पृथगाकारं पृथग्वृत्ति ।
जगदुच्चावचमुच्चैरेकेनैवात्मना चलति ॥१३०॥
जिस प्रकार एक ही ईखके गुड़, खाँड और शक्कर आदि
नाना प्रकारके विकार होते हैं, तथा एक ही सुवर्णके कङ्कण,
केयूर आदि पृथक्-पृथक् अनेक भेद होते हैं, उसी प्रकार भिन्न-
भिन्न स्वभाव, आकार और आचरणवाला उच्च और नीच जगत्
एक ही आत्माकी सत्तासे प्रवृत्त हो रहा है ।
स्कन्धधृतसिद्धमन्नं यावन्नाश्नाति मार्गगस्तावत् ।
स्पर्शभयक्षुत्पीडे तस्मिन्भुक्ते न ते भवतः ॥१३१॥
मार्गमें जानेवाला पुरुष, जबतक कन्धेपर रक्खे हुए बने-
बनाये भोजनको नहीं खाता, तभीतक उसके छूनेका भय और
क्षुधाकी पीड़ा रहती है; उसको खा लेनेपर वे दोनों ही
नहीं रहते ।
मानुषमातङ्गमहिषश्वसूकरादिष्वनुस्यूतम् ।
यः पश्यति जगदीशं स एव भुङ्क्तेऽद्वयानन्दम् ॥१३२॥
जो पुरुष हाथी, भैंसे, कुत्ते और शूकर आदिमें एक ही
जगदीश्वरको व्याप्त देखता है, वही अद्वैतानन्दका भोग करता है ।
३८