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सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 86 में से

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पृष्ठ 40

प्रबोधसुधाकर
ननु कथमावरणं स्यादज्ञानं ब्रह्मणो विशुद्धस्य ।
सूर्यस्येव तमिस्रं रात्रिभवं स्वप्रकाशस्य ॥१०७॥
शंका-अज्ञान विशुद्ध ब्रह्मका आवरण किस प्रकार कर
सकता है ? रात्रिका अन्धकार भी क्या स्वयंप्रकाश सूर्यको
ढक सकता है ?
दिनकरकिरणोत्पन्नैर्मेघैराच्छाद्यते यथा सूर्यः ।
न खलु दिनस्य दिनत्वं तैर्विकृतं सान्द्रसङ्घातैः॥१०८॥
अज्ञानेन तथात्मा शुद्धोऽपि च्छाद्यते सुचिरम् ।
न परन्तु लोकसिद्धा प्राणिषु तच्चेतनाशक्तिः ॥१०९॥
समाधान-जिस प्रकार सूर्य अपनी ही किरणोंसे
उत्पन्न हुए मेघोंसे ढक जाता है किन्तु उस मेघ-समूहसे
दिनके दिनत्वमें कोई विकार नहीं होता, उसी प्रकार शुद्ध आत्मा
भी चिरकालतक अज्ञानसे आवृत तो रहता है, परन्तु प्राणियोंमें
जो लोक-प्रसिद्ध चेतनाशक्ति है उसका आच्छादन नहीं होता ।
लिङ्गदेहादि-निरूपण
स्थूलशरीरस्यान्तर्लिङ्गशरीरं च तस्यान्तः ।
कारणमस्याप्यन्तस्ततो महाकारणं तुर्यम् ॥११०॥
स्थूल शरीरके भीतर लिङ्गदेह है, उसके भीतर कारणशरीर
है और उसके भी भीतर महाकारण नामक तुरीय आत्मा है ।
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