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सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 86 में से

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वैराग्य
इसी प्रकार मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि घरमें अतिथिके
समान रहे; किसी भी स्तुत्य अथवा तुच्छ विषयको दैववश स्थित अथवा
गया हुआ देखकर न तो सन्तुष्ट ही हो और न दुःख ही माने ।
ममताभिमानशून्यो विषयेषु पराङ्मुखः पुरुषः ।
तिष्ठन्नपि निजसदने न बाध्यते कर्मभिः क्वापि ॥८०॥
अपनेपनके अभिमानसे शून्य तथा विषयोंसे विमुख रहने-
वाला पुरुष अपने घरमें रहता हुआ भी कर्मोंसे कभी बाधित
नहीं होता ।
कुत्राप्यरण्यदेशे सुनीलतृणवालुकोपचिते ।
शीतलतरुतलभूमौ सुखं शयानस्य पुरुषस्य ॥८१॥
तरवः पत्रफलाढ्याः सुगन्धशीतानिलाः परितः ।
कलकूजितवरविहगाः सरितो मित्राणि किं न स्युः॥८२॥
हरी-भरी घास और सुकोमल श्वेत वालुकासे ढँके हुए
किसी वन्य-प्रदेशमें वृक्षकी शीतल छायामें सुखपूर्वक सोते हुए
पुरुषके फल-दलसे युक्त वृक्ष, मन्द सुगन्ध शीतल वायु, सब ओर
सुन्दर कलरव करते हुए पक्षी और नदियाँ भी क्या मित्र नहीं बन
जाते ? [ अर्थात् क्या इन सबमे उसका चित्त नहीं बहल जाता ? ]
वैराग्यभाग्यभाजः प्रसन्नमनसो निराशस्य ।
अप्रार्थितफलभोक्तुः पुंसो जन्मनि कृतार्थतेह स्यात् ॥
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