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सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 86 में से

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पृष्ठ 29

मनोनिग्रह
इह वा पूर्वभवे वा स्वकर्मणैवार्जितं फलं यद्यत् ।
शुभमशुभं वा तत्तद्भोगोऽप्यप्रार्थितो भवति ॥७२॥
इस जन्मके अथवा पूर्वजन्मके कर्मोंसे उपार्जित जैसे-जैसे
शुभ अथवा अशुभ फल होने होते हैं, उनके भोग भी बिना
माँगे उपस्थित हो जाते हैं ।
चेतःपशुमशुभपथं प्रधावमानं निराकर्तुम् ।
वैराग्यमेकमुचितं गलकाष्ठं निर्मितं धात्रा ॥७३॥
कुमार्गकी ओर दौड़ते हुए चित्तरूपी पशुको रोकनेके लिये
विधाताने एकमात्र वैराग्यको ही गलेका उचित काष्ठ बनाया ।
निद्रावसरे यत्सुखमेतत्किं विषयजं यस्मात् ।
न हि चेन्द्रियप्रदेशावस्थानं चेतसो निद्रा ॥७४॥
निद्राके समय जो सुख होता है क्या वह विषयजन्य होता
है ? [ कदापि नहीं ] क्योंकि चित्तका इन्द्रिय-गोलकोंमें न रहना
ही तो निद्रा है ।
अद्वारतुङ्गकुड्ये गृहेऽवरुद्धो यथा व्याघ्रः ।
बहुनिर्गमप्रयत्नैः श्रान्तस्तिष्ठति पतद्भ्रूसंश्र तथा॥७५॥
सर्वेन्द्रियावरोधाद्योगशतैर्निर्गमं वीक्ष्य ।
शान्तं तिष्ठति चेतो निरुद्यमत्वं तदा याति ॥७६॥
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