प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर
धरतीके आधिपत्यके लिये सदा अपने पिताके मरणका ही चिन्तन
करता रहता है ।
सर्वगुणैरुपपन्नः पुत्रः कस्यापि कुत्रचिद्भवति ।
सोऽल्पायू रुग्णो वा ह्यनपत्यो वा तथापि खेदाय ॥४१॥
सर्व-गुण-सम्पन्न पुत्र तो कभी कहीं किसीके होता है; वह
भी यदि अल्पायु, रोगी अथवा पुत्रहीन हुआ तो दुःखका ही
कारण होता है ।
पुत्रात्सद्गतिरिति चेत्तदपि प्रायोऽस्ति युक्त्यसहम् ।
इत्थं शरीरकष्टैर्दुःखं सम्प्रार्थ्यते मूढैः ॥४२॥
पुत्रसे सद्गति होती है-यह सर्वथा युक्ति-विरुद्ध है । [ हम तो
समझते हैं ] इस प्रकार मूढलोग शारीरिक कष्ट उठाकर दुःखोंको ही
मोल लेते हैं ।
पितृमातृबन्धुभगिनीपितृव्यजामातृमुख्यानाम् ।
मार्गस्थानामिव युतिरनेकयोनिभ्रमात्क्षणिका ॥४३॥
नाना योनियोंमें भ्रमण करते हुए पिता, माता, भाई, बहिन,
पितृव्य और जामाता आदि सम्बन्धियोंका मेल मार्गमें ठहरे हुए
पथिकोंके संयोगके समान क्षणभरके लिये ही होता है ।
दैवं यावद्विपुलं यावत्प्रचुरः परोपकारश्च ।
तावत्सर्वे सुहृदो व्यत्ययतः शत्रवः सर्वे ॥४४॥
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