प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
[ इस जगह Pb आदर्शमें तो मूल ही में, पर B आदर्शके हाशियेपर निम्नलिखित कथोपकथन
अधिक लिखा हुआ पाया जाता है । ]
इसके बाद जब राजा गौकी वन्दना करने लगा तो धनपाल भैंसको नमस्कार करता हुआ बोला-
[ ५७ ] अपवित्र वस्तु खाती है, विवेक-शून्य है, आसक्त होकर अपने पुत्रसे ही रति करती है,
खुराग्रसे और सींगसे जीवोंको मारती है । हे राजन् ! ऐसी यह गौ किस गुणसे वन्दनीय है ? ।
[ ५८ ] दूध देनेके सामर्थ्यसे अगर यह गौ वन्दनीय है तो, भैंस क्यों नहीं है ? भैंससे इसमें थोड़ी
भी तो विशेषता नहीं दिखाई देती ।
[ ५९ ] अमेध्य भक्षण करनेवाली गायोंका स्पर्श पापको हरनेवाला है, चेतनाहीन वृक्ष वन्दनीय है,
छागका वध करनेसे स्वर्ग मिलता है, ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ अन्न पितरोंको स्वर्गमें पहुँचता है,
छल-कपटपरायण देवता आप्त पुरुष हैं, अग्निमें हवन किया हुआ हवि देवताओंको प्रीत करता
है - इस प्रकारकी स्पष्ट दोषयुक्त और व्यर्थ श्रुतियोंके वचनोंकी लीलाको कौन ठीक मान सकता है !
[ ६० ] जिनका [ प्राणी- ] वध तो धर्म है, जल तीर्थ है, गौ वन्दनीय है, गृहस्थ गुरु है, अग्नि देवता
है, और ब्राह्मण पात्र है उनके साथ परिचय रखनेसे फल ही क्या हो !
एक बार, जिनपूजा करनेमें, दूसरोंसे पंडित ( धनपाल ) की विशेष एकाग्रता जानकर राजाने फूलकी
डाली देते हुए कहा कि देवोंकी पूजा करो। धनपाल शिव आदि देवताओंके स्थानों पर यों ही घूमकर जिन देवकी
पूजा करके चला आया । चार पुरुषके मुँहसे राजाने सारा वृत्तान्त जानकर पूजाका हाल पूँछा। उसने कहा कि
महाराज ! जहाँ [ पूजाका उचित ] अवसर हुआ वहाँ पूजा की । राजाने पूछा-' अवसर कहाँ नहीं हुआ ?'
पण्डित बोला-विष्णुके पास एकान्त कलत्र होनेसे; रुद्रके आधे शरीरमें पार्वती रहनेसे; ब्रह्माके यहाँ इस भयसे
कि कहीं ध्यानभंग होनेके कारण शाप न दे दें; विनायकके यहाँ इसलिये कि ये थालीभर मोदक खा रहे थे,
उनका स्पर्श मैंने रोका; चण्डिकाके यहाँ उनके शूलाग्रसे संत्रस्त महिष मेरे सामने न आ जाय इस भयसे,
हनुमानके यहाँ उन्हें कोपपूर्ण देखकर यह भय हुआ कि कहीं चपेटादान न कर बैठें; इस तरह, [ इन देवोंके
स्थानमें ] कहीं भी अवसर नहीं हुआ । और भी [ शिवलिंगको देखकर तो मनमें विचार आया कि - ]
[ ६१ ] इसके शिरके बिना पुष्पमाला व्यर्थ है, और जब ललाट ही नहीं है तो पट्ट बन्ध कैसे
हो ? जिसके कान और आँख नहीं है उसके लिये गीत और नृत्य कैसे ? और जिसके पैर ही नहीं
उसको मेरा प्रणाम कैसा ?
इत्यादि बातें कहने पर, राजाने कहा-'फिर अवसर हुआ भी कहीं ?' तब पंडितने 'प्रशमरसनिमग्नं' और 'नेत्रे
सारसुधा' इत्यादि ( वचन बोलकर ) और इसी प्रकारकी बातें कह कर अन्तमें कहा कि [ इस प्रकार ] जैनालय
में सदा अवसर रहता है, अतः वही मैने पूजा की ।
. [ ६२ ] इसके बाद-एक दूसरे दिन, शिवमन्दिरके द्वारदेशमें शृंगीगणको देख कर राजाने धनपाल
से पूछा कि-यह दुर्बल क्यों है ? वह बोला-[ शृंगी शिवकी निम्न प्रकारकी विचित्र ] लीलायें देखकर सोचता
रहता है कि-
[ ६३ ] यदि यह (शिव) दिगंबर है तो इसकी धनुष्यसे क्या काम है ? अगर धनुष्य है ही तो भस्म
क्यों ! यदि भस्म भी हुआ तो स्त्री क्यों ? और यदि स्त्री है तो फिर कामसे द्वेष क्यों है ?-इस
प्रकारकी अपने स्वामीकी परस्पर विरुद्ध चेष्टाओंको देखकर [ यह शृंगी हैरान हो रहा है और
इसी लिये ] शिराओंसे गाढ बँधे हुए अस्थि-शेष शरीरको धारण कर रहा है ।