प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ८-११ ] विक्रमाकॅराजाका प्रबन्ध [.९
'सर्वज्ञपुत्र' कह कर उनकी स्तुति कर रहे थे । 'सर्वज्ञपुत्र' इस विरुदसे कुपित होकर विक्रमादित्य ने
उनकी सर्वज्ञताकी परीक्षाके लिये मन-ही-मन प्रणाम किया । सिद्धसेन ने भी पूर्वगत श्रुतज्ञानके द्वारा राजाका
मनोगत भाव समझकर, दाहिना हाथ उठाकर धर्मलाभ का आशीर्वाद दिया । राजाने जब आशीर्वाद देनेका
कारण पूछा, तो महर्षिने कहा कि- तुम्हारे मानस नमस्कारके लिये यह आशीर्वाद दिया गया है। इस पर
उनके ज्ञानसे चकित होकर राजाने उनके पारितोषिक निमित्त एक करोड़ सुवर्ण वितरण किया ।
८) एक बार, एक दूसरे अवसरपर, राजाने कोषाध्यक्षसे अपने दिलाए हुए सुवर्णका वृत्तान्त पूछा,
तो वह बोला कि- धर्मकी बहीमें मैंने श्लोक बनाकर सुवर्णका वृत्तान्त लिखा है; जो इस प्रकार है -
६. दूर-ही-से हाथ उठाकर 'धर्मलाभ हो' इस प्रकार कहनेवाले सिद्धसेन सूरिको राजाने एक कोटि
[ सुवर्ण ] दिया ।
इसके बाद श्री सिद्धसेन सूरिको सभामें बुलाकर राजाने जब कहा कि- उस सुवर्णको ग्रहण कीजिये ।
तो उन्होंने कहा कि - खाये हुए को खिलाना वृथा है। उसी सुवर्णसे ऋणग्रस्ता पृथ्वीको ऋणमुक्त कीजिये ।
इस प्रकारका उपदेश मिलनेपर, सूरिके सन्तोषसे सन्तुष्ट होकर राजाने उस बातको स्वीकार किया ।
९) उसी रातको राजा वीरचर्या¹ निमित्त नगरमें घूम रहा था, उस समय एक तेलीको बारबार
इस (श्लोकार्थ) को पढ़ते सुना-
७. 'हमारा संदेश नारद ! कृष्णको कहना ।'
राजा सबेरा होनेतक रुका रहा पर उत्तरार्ध न सुन सका । उदास होकर राजमहलमें आकर सो गया ।
सबेरे सामयिक कृत्य करके राजाने उस तेलीको बुलाकर उत्तरार्ध पूछा । उसने कहा-
'जगत् दारिद्रयसे दुःखित है [ इस लिये ] बलिके बन्धनको छोड़ो ॥ ७ ॥'
यह सुनकर सिद्धसेन सूरिके उपदेशको फिरसे कहा हुआ समझकर पृथ्वीको ऋणमुक्त करना शुरू किया।
[ उज्जयिनीमें राजा विक्रमादित्य भट्टमात्र के साथ गुप्त वेश धारण करके महाकालके मंदिरमें
नाटक देखने गया । कुछ समयके बाद नागरिकके लड़के द्वारा कराये जानेवाले नाटकमें सूत्रधारके मुखसे उसका
वर्णन सुनकर राजाने भी उस नागरिकका धन ले लेनेके लिये मन-ही-मन लोभ किया । बादको कुछ समय
बीतनेपर वह प्यासा होकर मुख्य वेश्याके घर परसे भट्टके पाससे पानी मंगवाया । वहा बुढ़िया वेश्या प्रधान
पुरुषोंसे कह कर उसके लिये ईखका रस लेनेके लिये उपवनमें गई । काटनेवालोंसे ईख कटवाकर उसका रस
निकलवाया पर उससे घड़िया बिलकुल नहीं भरी तो मनमें दुखी होकर ऊपरका शकोरा भर कर ही बहुत देरसे
आई । राजाके रस पी लेनेपर भट्टमात्रने उसकी देरी और उदासीका कारण पूछा । वह बोली-ओर और
दिन तो एक ही ईखसे घड़ा और शकोरा दोनों भर जाते थे लेकिन आज तो घड़ा भी नहीं भरा। इसका कारण
समझमें नहीं आता । भट्टमात्रने फिर पूछा कि तुम लोग तो बड़ी पक्की बुद्धियाली होती हो इसलिये इसका
कारण जानकर और विचार करके बताओ । फिर वेश्या बोली कि-पृथ्वीके मालिक (राजा) का मन प्रजाके
प्रति विरुद्ध होगया है, इसलिये पृथ्वीका रस भी क्षीण होगया है। यह कारण उसने निवेदन किया तो
राजा भी उसके बुद्धिकौशलसे चकित हुआ । वह फिर अपने घरकी शय्यापर सोया हुआ इस प्रकार विचार
करने लगा कि प्रजा-पीड़न किये बिना, केवल विरुद्ध चिन्ता मात्रसे ही पृथ्वीके रसकी इस प्रकार हानि हुई ! तो
१ वीरचर्या - उस जमानेके राजा अपनी प्रजाके सुख दुःखकी बातें स्वय जानने-सुननेके लिये कभी कभी रातके
समय, एकाकी गुप्तवेशमें महलोंसे बाहर निकल जाते थे और दो चार घंटे इधर उधर घूम फिर कर नगर चर्चाका प्रत्यक्ष अनुभव
करते थे । इसका नाम वीरचर्या है ।
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