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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

प्रकरण ६५-६७ ] मयूर, बाण और मानतुङ्गाचार्यका प्रबन्ध [ ५५
मयूर, बाण और मानतुङ्गाचार्यका प्रबन्ध ।
६५) मयूर और बाण नामक दो साला-बहनोई पंडित, अपनी विद्वत्तासे एक दूसरेके साथ स्पर्द्धा
करते हुए भोजकी सभामें लब्धप्रतिष्ठ हुए । एक बार बाण पण्डित बहनसे मिलने गया और उसके घर
जाकर रातको द्वारपर सो गया । [ उस रातको रूठी हुई ] उसकी मानवती बहनको बहनोई द्वारा मनाती
सुना । [ बाणने ] उसपर ध्यान दिया तो उसने यह सुना--
१०९. हे तन्वंगी, प्रायः [ सारी ] रात बीत चली, चन्द्रमा क्षीणसा हो रहा है, यह प्रदीप मानों
निद्राके अधीन होकर झूम रहा है, और मानकी सीमा तो प्रणाम करने तक ही होती है, अहो !
तो भी तुम क्रोध नहीं छोड़ रही हो !-
[ काव्यके ] ये तीन पद बारंबार उसे कहते सुनकर [ वह चौथा पाद इस प्रकार बोल उठा- ]
' हे चण्डि ! कुचोंके निकटवर्ती होनेसे तुम्हारा हृदय भी [ उनके जैसा ] कठिन हो गया है ! '
भाईके मुँहसे यह चौथा पाद सुनकर वह लज्जित हो गई और कुपित होकर उसे शाप दिया कि ' तुम
कुष्ठी हो ! ' उस पतिव्रताके व्रतके प्रभावसे उसे उसी समय कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया । प्रातःकाल शालसे शरीर
ढककर राजसभामें आया । मयूरने मयूरकी भाँति कोमल वाणीसे उसे ' वरकोढी ' यह प्राकृत शब्द
कहा । इसपर चतुर चक्रवर्ती राजाने उसकी ओर विस्मयके साथ देखा । प्रसङ्गान्तर उठनेपर बाणने
देवताराधनका विचार किया और लज्जित भावसे वहाँसे उठकर नगरकी सीमापर गया । वहाँ पर एक स्तंभ
खडा कर नीचे खदिर काष्ठके अंगारोंसे भरा हुआ कुंड बनवाया । स्तंभके सिरेपर लटकाए हुए छींकेपर स्वयं
बैठ गया । वहा सूर्यदेवकी स्तुति बनाना प्रारम्भ किया । प्रति काव्यके अन्तमें छींकेकी एक एक रस्सी चाकूसे
काटने लगा । इस प्रकार पाँच काव्योंके अन्तमें उसने पाँच रस्सियां काट दीं । इसके बाद छींकेके अग्रभागमें
लगा रहकर उसने छठे काव्यसे सूर्यदेवको प्रत्यक्ष किया । उसके प्रसादसे तत्काल ही वह तेजवान् काञ्चनकी
कान्तिवाला हो गया । दूसरे दिन उत्तम वर्णके चन्दनका शरीरमें लेप करके और दिव्य श्वेत वस्त्र लपेट कर
[ राजसभामें ] गया । उसके शरीरसौन्दर्यको [ पूर्ववत् ] राजाने देखा तो मयूरने सूर्यके वरका फल बताया ।
यह सुनकर बाणने बाणकी भाँति इस वाणीसे मयूरका मर्म वेध किया कि ' यदि देवाराधन इतना सरल है
तो तुम भी कुछ कोई विचित्र कार्य करके दिखाओ न ? ' उसके ऐसा कहनेपर मयूरने जवाब दिया कि-
' नीरोग आदमीको वैद्यसे क्या काम ? फिर भी तुम्हारी बातको सच कर दिखानेके लिए अपने हाथ-पैर छुरीसे
काट देता हूँ और तुमने तो छठे काव्यमें सूर्यको प्रसन्न किया है, परन्तु मैं प्रथम काव्यके छठे अक्षरमें ही भवानी-
को प्रसन्न करता हूँ । ' यह प्रतिज्ञा कर सुखासनपर बैठकर चण्डिकाके मंदिरके पिछवाडे जाकर बैठ गया ।
वहाँ ' मा भांक्षीर्विभ्रमम् ' ( ऐसे आदि वाक्यावली चण्डिका-स्तुति प्रारम्भ की ) इसके छठे अक्षरपर ही
चण्डिका प्रत्यक्ष हुई और उसकी कृपासे उसका शरीरपल्लव प्रथम तक सुन्दर हो गया । अपने सामने ही
उस प्रसादको देखकर राजा और अन्य राजपुरुषोंने सामने आकर उसका जय-जय-कार किया और बड़े समारोह
के साथ उसका नगरमें प्रवेश कराया ।

' वरकोढी ' यह प्राकृत शब्द द्वि-अर्थी है । ' वर कोढी ' और ' वरक ओढी ' ऐसा इसका पदच्छेद किया जाता है ।
पहले पदमें वर=अच्छा, कोढी=कुष्ठी अर्थात् अच्छे कुष्ठी ( कुष्ठरोगी ) बने ऐसा व्यंग्य है । दूसरे पदमें वरक=शाल ओढी=ऊपर
डाली अर्थात् ' शाल ओढकर आये हो ! ' ऐसा आश्चर्यद्योतक वचन है ।