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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 181 में से

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पृष्ठ 79

५४ ] , प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
विद्याओंका कुछ अभ्यास करके विजया नामक अपनी नव युवती कन्याके साथ श्रीभोजकी सभाको सुशोभित
करती हुई श्रीभोज से बोली-
१०६. श्रीमन्महाराज भोज की शूरताकी सीमा तो शत्रुओंके कुलोंका क्षय करने तक है, यशकी सीमा
ठेठ ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड तक है, पृथ्वीकी सीमा समुद्रके तट तक है, श्रद्धाकी सीमा पार्वती-पति
(शिव) के चरणद्वन्द्वमें प्रणाम करने तक है, लेकिन बाकी जो अन्य गुण हैं उनकी तो कोई
सीमा ही नहीं है।
इसके बाद विनोद-प्रिय राजाने कुच-वर्णनके लिए विजयाको आज्ञा दी। वह बोली-
१०७. उस पतले शरीरवाली रमणीके स्तनमण्डलकी यदि, ऊँचाई चिबुक तक है; उत्पत्ति भुजलताके
मूल तक है; विस्तार हृदय तक है और संहति कमलिनी सूत्र तक है; वर्णकी सीमा स्वर्णकी
कसौटा तक है; और कठिनताकी सीमा हीरेकी खानवाली भूमि तक है, तो उसका लावण्य अस्त
समय (जीवनकी समाप्ति) तक है।
उसके इस वर्णनको सुनकर, उस आधे कवि राजाने कहा-
[७५] 'उस कमल-नयनीके दोनों कुचोंका क्या वर्णन किया जाय ?'-इसपर उसने आधा श्लोक यह
कहा- सात द्वीपके 'कर' (महसूल) ग्रहण करनेवाले आप जैसे जहाँ 'कर' (हाथ) देते
हैं। राजाने एक और आधा काव्य पढ़ा-
[७६] 'आघात किये हुए मुरजके समान गम्भीर ध्वनिवाले और भ्रमरोंके समान नील [वर्णवाले]
बादलोंसे वह दिशा रुद्ध-सी क्यों हो गई है ?'
इसके उत्तरार्धमें उसने कहा-
['इस लिये कि] प्रधन विरहके खेदसे म्लान बनी हुई वाला, जिसका मुख आँखोंके उगले हुए
आँसुओंसे धो गया है, वह वहाँ वास करती है।'
१०८. 'जगत्को आनंद देनेवाले उस सुरतको नमस्कार है'-इस प्रकार राजाके कहनेपर
[क्यों कि] 'जिसके आनुषंगिक फल हे भोजराज, आप जैसे पुरुष हैं।'
विजयाके इस विजयशाली वाक्यको सुनकर राजाने लज्जित होकर मुँह नीचा कर लिया। तब राजाने
उसे [अपनी] भोगिनी बनाई। एक बार उसने जालके भीतरसे आते हुए चन्द्र-कर (किरण) के स्पर्श
होनेपर [काव्य] पढ़ा-
[७७] हे फलकके शृंगारवाले चन्द्र ! बस करो इस करस्पर्शनकी लीलाको। तुम तो शिवके
निर्माल्य हो, इससे तुम्हारा स्पर्श करना उचित नहीं।
[७८] अनुद्यम परायण (आलसी) राजाओंके समान, क्षणभरमें तारायें क्षीण हो गईं; ग्राम्य
जनोंकी सभा में पण्डितकी पण्डिताईके समान चन्द्रमाकी कान्ति म्लान हो गई, जैसे मानों पारेने सोना
खा लिया हो वैसी प्राची दिशा पिंगलवर्णी हो गई और निर्धन पुरुषोंके गुणकी तरह ये दीपक
भी शोभा नहीं प्राप्त करते।
[७९] कलिकाल में सज्जनोंकी भाँति तारायें विरल हो गईं, मुनिके मनकी नाई आकाश सर्वत्र
प्रसन्न हो गया, सज्जनोंके चित्तसे दुर्जनकी तरह अन्धकार दूर हो रहा है और निरुद्यमियोंकी
लक्ष्मीकी तरह रात जल्दी जल्दी बीत रही है।
इस प्रकार यहाँ पर बहुत कुछ वक्तव्य (काव्य आदि कहने लायक) है जो परम्परा द्वारा जान लेना चाहिए।
-इस प्रकार सीता पंडिताका प्रसंग समाप्त हुआ।