प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ३९-४२ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३३
७. भोज और भीमका प्रबन्ध ।
३९) इसके बाद [सं० १०७८ के साठ] जब मालवमण्डल में श्री भोजराज राज्य करता था,
तब इधर गूर्जरभूमि में चौलुक्य चन्द्रमूर्ति भीम पृथिवीका शासन करता था ।
एक रात्रिके अन्तमें राजा भोजने, अपने चित्तमें लक्ष्मीकी अस्थिरताको विचारते हुए और अपने
जीवनको भी तरंगकी भाँति चञ्चल समझते हुए, प्रात कृत्यके बाद, दानमण्डपमें बैठकर नौकरोंके द्वारा
याचकोंको बुला, यथेच्छ सुवर्ण टंकोंका ( सोनेकी मोहरोंका ) दान देना प्रारम्भ किया ।
४०) इस पर, रोहक नामक उसके मन्त्रीने, खजानेका नाश होता देख, राजाके औदार्य गुणको दोष
समझते हुए उसे रोकनेके लिये अन्य उपायोंसे समर्थ न होकर, एक दिन सर्वानसर ( न्याय सभा ) के उठ जाने
बाद सभामण्डपके भारेण्ड पर खड़ियासे इन अक्षरोंको लिख दिया—आपत्ति कालके लिये धनकी रक्षा
करनी चाहिए ।
प्रात काल यथा समय राजाने उन अक्षरोंको पढ़ा । सभी परिजनोंमेंसे किसीने भी जब उस कार्यके
करनेका स्वीकार नहीं किया तो राजाने उसके साथ यह लिख दिया—भाग्यवान्को आपत्ति कहा है ।
इस पर मन्त्रीने जवाबमें लिखा कि—कभी दैव कुपित हो जाय तो ? ।
इस पर राजाने फिर उसके सामने लिख दिया कि—[ तब तो ] सञ्चित भी विनष्ट हो जायगा ।
इससे निरुत्तर होकर उस मन्त्रीने अभय वचन माँगकर उस कथनको अपना लिखा बताया । बादमें
राजाने कहा, कि मेरे मनरूपी हाथीको ज्ञानरूप अंकुशसे वशमें रखनेके लिये महामात्रके समान ५००
पण्डितोंका यह समूह यथेच्छ रूपसे अपना अपना ग्रास प्राप्त किया करें¹ ।
राजाने अपने जीवनका ध्येय सूचित करनेवाली ऐसी चार आर्याओंको अपने कङ्कणपर खुदवाईं²
जिनका अर्थ यह है—
४४. यही उपकार करनेका अवसर है, जब तक कि स्वभावत ही चञ्चल ऐसी यह सम्पत्ति विद्यमान
है । फिर वह विपत्ति कि जिसका उदय भी निश्चित है, उसके आनेपर उपकार करनेका अवसर
कहाँ रहेगा ? ।
४५. हे पूर्णिमाके चन्द्रमा ! अपने किरण-समूहकी समृद्धिसे अभी आज इस सारे भुवनको उज्ज्वल
कर दे । [ फिर यह मौका न मिलेगा, क्यों कि ] निर्दय विधाता चिरकाल तक किसीका सुस्थिर
होना सह नहीं सकता ।
४६. ऐ सरोवर ! दिन और रात याचकोंका उपकार करनेका यही अवसर है । यह जल तो उन
पुराने बादलोंके उदय होनपर फिर सर्व सुलभ ही है ।
४७. ऐ किनारेके वृक्षोंको गिरा देनेवाली नदी ! यह सुदूर तक उन्नत दिखाई देनेवाला पानीका पूर तो
कुछ ही दिनों तक ठहरेगा, पर यह एक पातक ( पेड़का गिरा देना ) तो चिरस्थायी होकर
रहेगा । और फिर—
१ इसका मतलब यह है कि राजा भोजने अपन पास ५०० पंडित रक्खे थे जिनके निवाहके लिय राज्यकी ओरसे स्थायी
ग्रासका प्रबन्ध कर दिया गया था ।
२ पुराने जमानेमें यह एक प्रथा थी कि-विचारशील लोग, जिस किसी सद्विचारको अपना जीवन ध्येय बना लेते
थे उसका सतत स्मरण रहा करे इसलिये उस विचारके सूत्रको अपने हाथक कङ्कणपर उत्कीण करा ( खुदा ) लेते थे और उसका
सदैव अवलोकन किया करते थे । वस्तुपाल आदि अन्य भी महापुरुषोंने अपने जीवनसूत्र कङ्कणपर खुदवा रक्खे थे ।
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