प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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इस तरहके उसके अन्य बहुत वाक्य हैं जो परम्पराके अनुसार जानने चाहिये* ।
बादमें उस मुञ्ज को मारकर उसका सिर सूलीमें पिरोकर अपने आँगनमें रखवाया और उसमें रोज दही
लगवा लगवाकर अपने अमर्षका पोषण करता रहा ।
४२. जो मुञ्ज यशका पुञ्ज था, हाथियोंका पति था, अवन्ती का स्वामी था, सरस्वतीका पुत्र था, प्राचीन
कालके जैसा कृती पुरुष था; वही कर्णाट देशके राजाके द्वारा अपने नेत्रोंकी दुर्बुद्धिसे
पकड़ा गया और सूलीपर चढ़ा दिया गया । हाय, कर्मकी गति कैसी विषम है !
*
३८ ) उसके बाद, मालवा मण्डलके मंत्रियोंने जब यह वृत्तान्त सुना तो, उन्होंने फिर उसके
भतीजे भोज को राज्य पदपर अभिषिक्त किया ।
इस प्रकार श्रीमेरुतुङ्गाचार्य रचित प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थका 'राजा श्रीविक्रमादित्य प्रभृति
महासाहसिक और परोपकार-आदि गुणरूपी रत्नोंसे अलंकृत राजाओंके चरित्र' नामक यह पहला
प्रकाश समाप्त हुआ।
- मालूम होता है मुंजकी यह करुण कथा उस जमानेमें बहुत लोक प्रसिद्ध और लोक साहित्यकी विशिष्ट वस्तु बनी
हुई थी । मेरुतुङ्गसूरिने जो यहाँ पर ये कुछ संस्कृत, प्राकृत और देश्य पद्य दिये हैं वे या तो भिन्न भिन्न कर्तृक मुंज विषयक
प्रबन्धोंमेंसे उद्धृत किये गये हैं; या परम्परासे सुनकर लिख लिये गये हैं । मुंजकी इस कथामें एक तो लक्ष्मीकी अस्थिरता और दूसरी
स्त्रीकी अविश्वसनीयता और तीसरी मुंज जैसे महाबुद्धिमान् शक्तिमान् राजाकी, दुश्मनके द्वारा की गई त्रासोत्पादक विडम्बना—
इन तीन बातोंका विचित्र संघटन हो जानेसे उपदेशकोंको अपने उपदेशकेलिये यह एक वास्तविक घटनाका बतलानेवाला करुण
रसका बोधदायक आख्यान ही मिल गया । अभी तक निश्चय नहीं हो सका कि इस कथामें ऐतिहासिक तथ्य कितना है और
प्रबन्धकारोंकी बनावट कितनी है । यहाँपर जो पद्य दिये गये हैं वे तो प्रबन्धकारोंकी उपदेशात्मक उक्तियों मात्र हैं । कुछ पद्य तो
मेरुतुङ्गसूरिके भी पीछेके बने हुए हैं और किसीने प्रसङ्गोचित समझकर इस ग्रन्थमें प्रक्षिप्त कर दिये हैं ।
१. दही लगानेका मतलब यह कि उसे देखकर कौए आवें और उस मस्तकपर बैठें । किसी दुश्मनका
बहुत ही बुरा चाहना होता है तब लोग बोला करते हैं कि—उसके सिरपर तो कौए बैठेंगे । उसी लोकोक्तिका सूचक
यह कथन है ।