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प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

प्रकरण ३०-३४ ] मूलराजादिका प्रबन्ध
मूलराजके वंशज ।
[ १८ ] अपने सारे शत्रुओंको समाप्त करके जब वह-( मूलराज )-कथाशेष होगया ( मृत्युंको प्राप्त
हुआ ) तो उसके बाद पृथ्वीमण्डलका आभूषण ऐसा चामुण्डराज राजा हुआ ।
[ १९ ] उसकी सेनाका साज, शत्रुओंकी स्त्रियोंके मनको संतप्त होनेकी विद्या सिखानेमें निपुण पण्डित
था और उसके सैन्यने इन्द्रको भी भयभीत कर दिया था ।
[ २० ] उसके हाथरूपी कमलोंमें रहनेवाली, कोश ( १ म्यान; २ कमल ) में विलास करनेसे चमकती
हुई तलवार रूपी भौंरोंकी श्रेणीने राजाओंके वंशोंको भिन्न कर दिया ।
३०) संवत् १०५३ से लेकर १३ वर्षतक चामुण्डराजने राज्य किया ।
[ २१ ] जिसकी कीर्ति तीनों लोकोंमें प्रकाशित हो रही है, और जो महीपतियोंमें श्रेष्ठ माना जाता है
ऐसा वल्लभराज नामक उसका पुत्र राजा हुआ ।
[ २२ ] वह दृढ़ पौरुषवाला राजा शत्रुओंकी नगरियोंको घेरे रहता था इसलिये विशेषज्ञोंने उसका
नाम ' जगत्-झम्पन ' रखा था ।
३१) सं० १०६६ से लेकर ६ महीने तक राजा वल्लभराजने राज्य किया ।
[ २३ ] जिसमें रजोगुण और तमोगुणका अभाव था और जिसके जैसा यश प्राप्त करना औरोंके लिये
अत्यंत दुर्लभ था, ऐसा दुर्लभराज नामका उसका छोटा भाई [ उसके बाद ] राजा हुआ ।
[ २४ ] साँपकी भाँति, काल करवाळ ( कठिन तलवार ) से सुरक्षित होकर उसका राज्य, निधानके
समान, अन्यों ( शत्रुओं )का भोग न हो सका ।
[ २५] सौभाग्यसे प्रकाशमान उस राजाका कर ( १ हाथ; और २ मालगुजारी ) सर्वथा अनुपभोग्य
ऐसी परस्त्री पर और ब्राह्मणोंको प्रदान की हुई भूमिपर, कभी नहीं पड़ा ।
३२) सं० १०६६ से लेकर ११ साल ६ महीने तक श्रीदुर्लभराजने राज्य किया । इस राजा
दुर्लभने पत्तनमें ' दुर्लभ सर ' नामक सरोवर बनवाया ।
[ २६ ] फिर, उसके भाईका लड़का ' भीम ' नामक राजा हुआ जिसकी प्रवृत्ति तीनों जगत्‌को
अभीष्ट फल देनेवाली हुई ।
*
[ यहाँ A आदर्शका अनुसरण करनेवाली मुद्रित पुस्तकमें, यह समय-सूचक पाठ इस प्रकार है- ]
[ इसके बाद सं० १५० ( ? १०५२ ) श्रावण सुदी ११ शुक्रवारको पुष्य नक्षत्र और वृष लग्नमें
श्री चामुण्डराजका राज्यारोहण हुआ। इसने पत्तनमें चन्द्रनाथ देव और चाचिणेश्वरके मन्दिर बनाये ।
सं० ५५ ( ? १०६५ ) आश्विन सुदी ५से लेकर १३ वर्ष १ मास २४ दिन राज्य किया ।
सं० १०५५ ( ? १०६५ ) आश्विन सुदी ६ मंगलवार, ज्येष्ठा नक्षत्र, मिथुन लग्नमें श्रीवल्लभ
राजदेव गद्दी पर बैठा ।
इस राजाने जब मालवा देशकी धारानगरीके प्राकार ( किलेको ) घेर रक्खा था उसी समय शीती,
रोगसे इसकी मृत्यु हुई । इसके दो विरुद थे-' राज मदन शंकर ' ( राजारूपी कामदेवके लिये शिव )
और ' जगज्झम्पन ' । सं० १० ( ? १०६६ ) चैत्र सुदी ५ से लेकर ५ महीने २९ दिन तक इस
राजाने राज्य किया ।
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