प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १६९-१७५ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ ११७
[ १३२ ] इसने लड़ाईमें तो वीरोंके भी सामने अपने पैर उठाये, पर उनकी स्त्रियोंके सामने तो वह
अपना मुख ही नीचा कर लेता था ।
[ १३३ ] हृदय ( छाती ) में लगे हुए जिसके बाणसे क्लान्त हो कर, जाँगलके राजाने तो अपना
सिर घुमाया ही पर उसकी प्रशंसा करने वालों दूसरोंने भी अपना सिर घुमाया ।
[ १३४ ] कोंकण देश का नरेश, जो मारे गर्वके रत्नमय मुकुटकी प्रभासे चमत्कृत ऐसे अपने
सिरको न नवाना चाहा तो इस राजाने अपने बाणोंसे उसके सिरको टुकडे टुकडेकर दिया ।
[ १३५ ] रागवश हो कर जिस राजाने युद्धमें बल्लाल और मल्लिकाऽर्जुन राजाओंके सिरोंको, जयश्रीके
दोनों कुचोंकी तरह ग्रहण किया ।
[, १३६ ] जिस राजाने दक्षिण देशके राजाको जीत कर उससे दो द्विप ( हाथी ) ग्रहण किये ।
मानों वे इस लिये कि उसके यशसे हम इस विश्वको नष्ट-विपद् बनायेंगे ।
[ १३७ ] शत्रुओंकी पत्नियोंके कुचमण्डलको त्रिहार ( त्रिगत हार ) बनाते हुए जिस राजाने मही-
मण्डलको उद्दण्डविहार ( जैनमन्दिर ) वाला बनाया ।
[ १३८ ] जिसने पादद्म महीपालों और तृणको मुंहमें दबाने वाले पशुओंके द्वारा मानों प्रार्थित हो
कर ही उत्तम अहिंसा व्रतको ग्रहण किया ।
१७३) सं० ११९९ से [ १२३० तक ] ३१ वर्ष तक श्री कुमार पाल ने राज्य किया ।
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अजयपालका राज्याभिषेक ।
१७४) सं० १२३० वर्षमें अजय देव का राज्याभिषेक हुआ । ( इस राजाके वर्णनके कुछ विशिष्ट
श्लोक भी P आदर्शमें इस प्रकार पाये जाते हैं-)
[ १३९ ] इस [ कुमारपाल ] के बाद कल्पद्रुमके समान अजयपाल नामक राजा हुआ जिसने
वसुन्धराको सोनेसे भर दिया ।
[ १४० ] जिसने जाँगल देश ( के राजा ) के गले पर पैर रख कर उससे दण्डमें सोनेकी मण्डपिका
( माँडवी = पालकी जैसी ) और कई मत्त हाथी ग्रहण किया ।
[ १४१ ] उद्दाम तेजसे सूर्यकी भी भर्त्सना करने वाले जिस राजाने, परशुरामकी तरह, क्षत्रियोंके
रक्तसे धोई हुई पृथ्वीको श्रोत्रियोंकी रक्षाका पात्र बनाया ।
[ १४२ ] जिस राजाके तीनों गण (= धर्म, अर्थ, काम) नित्यदान देनेसे, नित्य राजाओंको दण्ड
देनेसे और नित्य स्त्रियोंसे विगाह करनेसे, समान हो कर रहे ।
[ १४३ ] राजाओंके नेपथ्यको धारण करने वाले [ उस राज्य नाटकमें ] शतक्रतु ( इंद्र ) [ का अभिनय
करने वाले इस राजा ] के चले जाने ( मर जाने ) पर इसके पुत्र मूलराजने जयन्तका
अभिनय किया ।
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अजयपालका जैन मन्दिरोंका नाश करना ।
१७५) यह अजय देव जब पूर्वजोंके बनाये मंदिरोंको तुड़ाने लगा तो सीहण नामक कौतुकी,
राजाके सामने नाटकका प्रसंग उपस्थित कर, उसमें, अपनेको कृत्रिम रोगी कल्पित कर, तृणके बने हुए पाँच