प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश
हेमचन्द्र सूरिको लूता रोग लगना ।
१६९) अब एक बार, कच्छप राज लखराज की महासती माताने जो मूलराज को शाप दिया
था कि उसके वंशजोंको लूता रोग हो जाया करेगा, तदनुसार, कुमार पालने जब गृहस्थ धर्म (श्रावकपन)
के व्रत ग्रहण किये तब उसने अपना राज्य गुरु श्री हेमचन्द्र को समर्पण कर दिया था, इसलिये उसी छिद्रमे (इस
राज्यसम्बन्धके छलसे) सूरिको भी वह लूता रोग संक्रामित हुआ। इसे देख सभी राजलोकके साथ राजा दु खित
हुआ, तब प्रभुने प्रणिधानसे अपनी आयु प्रचुर समझ कर अष्टाङ्ग योगाभ्यासके द्वारा, लीला (क्रीडा) के
साथ उस रोगको नष्ट कर दिया ।
१७०) किसी समय, कदली पत्र पर आरूढ किसी योगीको देख कर विस्मित बने हुए राजाको प्रभुने
भूमिसे चार अगुल ऊपर अधर रह कर ब्रह्मरन्ध्रमे निकलता हुआ तेज पुञ्ज दिखाया ।
*
हेमचन्द्रसूरि और कुमारपालका स्वर्गवास ।
१७१) चौरासी वर्षकी अवस्थाके अन्तमें प्रभुने अपना अन्तिम दिन समीप आया समझ कर, अनशन
पूर्वक अन्वाराधन क्रिया प्रारंभ की । उसे देख कर दु खित हुए राजाको प्रभुने कहा कि – ' तुम्हारी आयु
भी अब ६ महीना ही बाकी है । सन्तानाभावके कारण अपने वर्तमान रहते ही अपनी सब उत्तर क्रिया
कर-करा लेना ।' यह आदेश दे कर दशम द्वारसे उन्होंने अपना प्राणत्याग कर दिया। फिर इसके बाद प्रभुके
सस्कार स्थान पर, यह समझ कर कि, उनके देहकी भस्म भी पवित्र है, राजाने तिलक करके नमस्कार किया। इसके
बाद सभी सामन्त और नागरिक लोगोंने वहाँ की मिट्टी ले ले कर तिलक करना शुरू किया जिससे वहा पर
गढ्ठा हो गया । वह गढ्ठा आज भी 'हेम खड्डु' नामसे प्रसिद्ध है ।
१७२) अब फिर, राजा प्रभुके शोकमें विकल हो कर आँखोंमें आँसू भर भर रोने लगा जिस पर
मन्त्रियोंने उसे वैसा न करनेकी विज्ञप्ति की, तो वह बोला – 'मै उन प्रभुके लिये शोक नहीं कर रहा हूँ जिन्होंने
अपने पुण्यसे उत्तमसे उत्तम लोक अर्जित किया है, मै तो अपने इस सर्वथा त्याज्य ऐसे सप्ताङ्ग राज्यके लिये
शोक कर रहा हूँ, कि राज्यपिण्ड दोषसे दूषित होनेके कारण मेरा पानी भी इन जगद्गुरुके अगमें नही लगा –'
इस प्रकार प्रभुके गुणोंको स्मरण करता हुआ चिरकाल तक विलाप करते रहा और अन्तमें प्रभुके कहे हुए
दिन पर उन्हींकी उपदिष्ट विधिसे समाधि पूर्वक मर कर उस राजाने स्वर्गलोक अलंकृत किया ।
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यहाँ पर P प्रतिमें निम्नोद्धृत श्लोक अधिक प्राप्त होते हैं-जो सोमेश्वरकी कीर्तिकौमुदीके हैं-
[ १२८ ] पृथु आदि पूर्व राजाओने स्वर्ग जाते समय जिस राजाके पास अपने गुणरूपी रत्नोंको मानों
न्यासके रूपमें रख दिया था ।
[ १२९ ] इस राजाने न केवल युद्धक्षेत्रमें अपने बाणोंसे मात्र शत्रुओंको ही जीत लिया था, किंतु अपने
लोकप्रीतिकर गुणोंसे इसने पूर्वजोंको भी जीत लिया ।
[ १३० ] राग और रतिसे रहित, ऐसे ( अथवा वीतरागमें प्रीतिवाले) इस नृदेवकी, मृतकोंके धनको
छोड़ देनेके कारण, देवताकी नाई अमृतार्थता सिद्ध हुई । ( क्यो कि देवता अमृतके अर्थी
होते हैं, और यह मृतका अर्थ नहीं लेता था ।)
[ १३१ ] इस राजाने तलवारकी धारमें नहाई हुई वीरोंकी श्री (लक्ष्मी) ही ग्रहण की, किंतु आँसूकी
धारासे धुली हुई कायरोंकी ( और निरपत्य जनोंकी ) श्री नहीं ली ।