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प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 181 में से

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पृष्ठ 116

प्रकरण १२५ ] सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकल पद्य । [ ९१
१७६. हे सिद्धराज, नत हो जाने पर तो तुमने आनाक भूपको अनेक लाखोंके साथ सपादलक्ष
[ जैसा देश ] भी दे दिया और दत्त ऐसे यशोवर्माके पास मालव ( मालवा देश; श्लेषार्थ मा=लक्ष्मीका ल्व=
लेशमात्र ) का होना भी तुमने सहन नहीं किया ।
इत्यादि बहुतसी स्तुतियां और प्रबंध उसके बारेमें हैं जो [ ग्रन्थान्तरोंसे ] जानने योग्य हैं ।
सं० ११९० से ले कर [ ११९९ तक ] ४९ वर्ष तक श्री सिद्धराज जयसिंह देव ने राज्य किया।
*
इस प्रकार श्री मेरुतुङ्गाचार्यके बनाये हुए प्रबंध चिन्तामणिमें श्री कर्ण और श्री सिद्धराजका चरित्र
वर्णन नामक यह तीसरा प्रकाश समाप्त हुआ ।
यहाँ पर P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं । ये श्लोक सोमेश्वरदेव रचित कीर्त्ति-
कौमुदीके हैं और इनमें संक्षेपमें सिद्धराजके जीवनके महत्त्वके सभी वीर कार्योंका सूचन किया गया है-
[ १०६ ] जिसने, बालक होते हुए भी, इंद्रकी वीरवृत्तिको भी लांघ जाने वाले अपने कोपके प्रभावसे
दुष्ट राजाओंको आज्ञाधीन बनाया ।
[ १०७ ] अपार पौरुषके उद्गारवाले सौराष्ट्रिय खंगार को भी, जिस गुरुमत्सरने युद्धमें इस प्रकार
पीस डाला, जैसे सिंह हाथीको पीसता है ।
[ १०८ ] जिसने रामचंद्रकी तरह असंख्य घोड़ोंकी सेना ले कर और अनेक राजाओंको नष्ट करके
( रामके पक्षमें-पर्वतोंको उखाड कर ) सिन्धुपतिको (सिद्धराजके पक्षमें - सिन्धुराज
नामका राजा, रामके पक्षमें सिन्धु=समुद्र ) बाँध दिया ।
[ १०९ ] मनमें अमर्ष करके पक्षीय उर्वीभृत् ( एक अर्थ - पर्वत, दूसरा - राजा ) के उन्नत होने पर,
जिसने अगस्त्य मुनिकी भाँति, शीघ्र ही अर्णोराज (एक अर्थ-समुद्र; दूसरा-शाकंभरी का
चाहमान राजा ) को शुष्क कर डाला ।
[ ११० ] विष्णुने तो अर्णोराज ( समुद्र ) की पुत्री ले ली थी, किन्तु इसने तो अर्णोराजको अपनी
पुत्री दे दी* । विष्णु और इस सिद्धराज में एक यही अंतर है ।
[ १११ ] शत्रुओंके कटे हुए सिर देख कर शाकंभरीके ईशने भी शंकित हो कर इसके चरणोंमें
अपना सिर झुका दिया ।
[ ११२ ] स्वयं अत्यंत लक्ष्मीवान् और अपरमार ( दूसरोंको न मारनेवाला ) हो कर भी युद्धमें जिसने
मालवस्वामी ( एक अर्थ - मालव देशका राजा, दूसरा श्लेषार्थ - लक्ष्मीका किंचित् भोक्ता )
परमारको मार डाला ।
[ ११३ ] जिसने धारा-नरेश को राज-शुककी तरह काष्ठ-पंजर ( काठके पिंजड़े ) में रख कर
अपनी कीर्तिरूपा राजहंसीको काष्ठा-पंजर ( दिक्चक्रवाल ) में छोड़ दिया ।
[ ११४ ] जिसने नरवर्मा राजाकी तो केवल एक ही नगरी जो धारा थी वह ले ली, पर उसकी
वधुओंको [ बदलेमें ] हजारों अश्रु-धारायें दे दीं ।

  • शाकंभरी ( अजमेर ) के चाहमान राजा अर्णोराजको, जिसका देस्य नाम आनाक या आना था, सिद्धराजने युद्ध
    करके पहले तो अपना आज्ञाधीन राजा बनाया और फिर पीछेसे उसको अपनी पुत्री ब्याह दी थी । इसीका सूचन इस पद्यमें है ।
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