फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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पक्षोद्भवं हिमकरस्य विशेष्टामाहुः
स्थानोद्भवं तु बलमप्यधिकं परेषाम् ।
तत्संप्रयुक्तमितरैरधिकाधिकं स्या-
दन्यानि तेन सदृशानि बहूनि ते स्युः ॥ २१ ॥
चन्द्रमा के पक्षबल को विशिष्ट (विशेष महत्त्व का ) कहा है । अन्य
ग्रहों के स्थान बल को विशेष महत्त्व देना चाहिये ।
वैसे कई प्रकार के बलों के योग से—षड् बल पिंड में ग्रहों के षड्बलों का
योग—किसी का किसी से अधिक हो जाता है क्योंकि कई प्रकार के बलों
में कोई किसी प्रकार के बल में अधिक होता है, कोई किसी अन्य प्रकार
के बल में ।
बलपिंड
सार्द्धानि षट्तीक्ष्णकरो बलीयान् चन्द्रस्तु षट्पञ्च वसुन्धराजः
सप्तेन्दुसूनो रविवद्गुरोस्तु सार्द्धानि पञ्चाथ सितो बली स्यात्।२२॥
अब यह बात बताते हैं कि कितने 'रूप' बल प्राप्त होने पर ग्रह को
बली कहना ।
सूर्य को यदि ६।। रूप बल प्राप्त हों तो वह बली कहलाता है । चन्द्रमा
६ रूप बल मिलने से बली और मंगल ५ रूप बल प्राप्त करने से ही बली
समझा जाता है । इसी प्रकार बुध को ७ रूप, बृहस्पति को ६।। और शुक्र
को ५।। रूप बल प्राप्त होने से वह बली कहलाता है ॥ २२ ॥
मन्दस्तु पञ्चैव हि षड्बलानां संयोग एवापरथान्यथा स्युः ।
एवं ग्रहाणां स्वबलाबलानि विचिन्त्य सम्यक्कथयेत्फलानि ॥२३॥
शनि को यदि ५ रूप बल भी प्राप्त हो तो वह बली कहलाता है । यदि
किसी ग्रह का षड्बल पिंड ऊपर बतायी गई संख्या से कम हो तो वह निर्बल
समझा जावेगा । इस प्रकार किस ग्रह का कितना बल है यह अच्छी तरह
विचार कर फलादेश करना चाहिये ॥ २३ ॥