फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय : ग्रह बल ९९
ग्रहों को षड्बल पिंड में—प्रत्येक को कितने रूप प्राप्त होने
से वह बली समझा जाना चाहिये यह बता चुके हैं। अब अन्य शास्त्रों
के आधार पर यह बताया जाता है कि (१) स्थान, (२) दिक्, (३)
चेष्टा, (४) काल और (५) और अयन--इन पांच प्रकार के बलों में
प्रत्येक को कितना बल मिलने से वह बली समझा जावे। नैसर्गिक बल
में कम-से-कम कितने रूप मिलने चाहिएं यह इसलिये नहीं कहा क्योंकि
नैसर्गिक बल का परिमाण, प्रत्येक ग्रह का, प्रत्येक कुंडली में एक ही
होता है।
ग्रह स्थान दिक् चेष्टा काल अयन योग
रू. ष. रू. ष. रू. ष. रू. ष. रू. ष. • रू. ष.
सूर्य २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२
चन्द्र २-१३ ०-५० ०-३० १-४० ०-४० ५-५३
मंगल १-३६ ०-३० ०-४० १- ७ ०-२० ४-१३
बुध २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२
बृहस्पति २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२
शुक्र २-१३ ०-५० ०-३० १-४० ०-४० ५-५३
शनि १-३६ ०-३० ०-४० १- ७ ०-२० ४-१३
एक रूप में ६० षष्ट्यंश होते हैं। यहाँ यह शंका नहीं करनी चाहिये
कि श्लोक २२ में तो यह कह दिया कि सूर्य के ६ प्रकार के बलों का योग
६।। (६ रूप ३० षष्ट्यंश) हो तो बली समझना और यहाँ केवल पांच
प्रकार के बलों का योग ६ रूप ३२ षष्ट्यंश बता दिया। यह इसी प्रकार
है जैसे परीक्षा में ६ पत्र हों तो टोटल में ३३ प्रतिशत में पास (सफल
या उत्तीर्ण) समझा जाता है, परन्तु प्रति पत्र में ४० प्रतिशत से पास
समझा जावे।