फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय : ग्रह बल ८३
यदि किसी ग्रह पर पापों ग्रहों की दृष्टि हो तो उसे पाप-दृष्ट कहते हैं।
पाप दृष्टि भी उपर्युक्त प्रकार से गणित कर निकाली जाती है। जातक-
पद्धति आदि में दृष्टि की सारणियां दी हुई रहती हैं।
यदि शुभ दृष्टि अधिक हो तो पाप दृष्टि को उसमें से घटाकर जो
शेष बचे उसे पूर्व के स्थान बल, काल बल आदि के सम्मिलित योग में जोड़
देना चाहिये। किन्तु यदि पाप दृष्टि अधिक हो तो इसमें से शुभ दृष्टि
को घटाकर जो शेष बचे वह स्थान बल, काल बल आदि के सम्मिलित योग
में से घटा देनी चाहिये। जो शेष बचे षड्बलपिंड या छः प्रकार के बलों
का योग कहलाता है।
ग्रहों का बल कैसे निकाला जाता है इसका कुछ परिचय करा
देने के बाद भाव बल निकालना बताते हैं।
भाव बल
भाव बल ३ बलों का सम्मिश्रण कर निकाला जाता है—
(१) भावेश बल,
(२) भाव दिग्बल तथा
(३) शुभ दृष्टि बल।
भाव के स्वामी के बल को भावेश बल कहते हैं।
भावदिग् बल
(क) मिथुन, कन्या, तुला कुंभ तथा धन का पूर्वार्द्ध द्विपद राशियां
हैं। यह यदि लग्न में हो तो एक रूप बल प्राप्त होता है। सप्तम में हो
तो शून्य मध्य, में किसी भाव में हो तो अनुपात से ।
(ख) मेष, वृषभ, सिंह तथा धनु का उत्तरार्द्ध और मकर का पूर्वार्द्ध
चतुष्पाद राशियां हैं। यदि यह दशम में हों तो एक रूप बल प्राप्त होता