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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

८२ फलदीपिका
शुक्र ४२.८५ ,,
बृहस्पति ३४.२८ ,,
बुध २५.७० ,,
मंगल १७.१४ ,,
शनि ८.५७ ,,
दृक् बल
दृक् बल कहते हैं दृष्टि को। जिस ग्रह पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होती
है उसे शुभ दृष्ट कहते हैं। दृक् बल निकालने में जिस ग्रह की अन्य ग्रह पर
दृष्टि होती है, उन दोनों का अन्तर (कितने अंश का फासला है) निकाल-
कर गणितानुसार दृष्टि निकाली जाती है।*
*टिप्पणी—सूर्य,, चन्द्र, बुध, शुक्र की अपने से ३० अंश पर शून्य, ६०
अंश पर चौथाई दृष्टि होती है : ९० अंश पर त्रिपाद, १२० अंश
पर आधी, १५०° पर शून्य, १८० अंश पर पूर्ण २१०° पर
त्रिपाद, २४० अंश पर आधी और २७० अंश पर चौथाई, ३००
अंश पर शून्य। मध्य में अनुपात से निकालना चाहिये। मंगल,
बृहस्पति तथा शनि की कितने अंश पर कितनी दृष्टि होती है
यह नीचे बताया जाता है।
मंगल बृहस्पति शनि
३० अंश पर शून्य शून्य शून्य
६० ,, चौथाई चौथाई पूर्ण
९० ,, पूर्ण त्रिपाद त्रिपाद
१२० ,, आधी पूर्ण आधी
१५० ,, शून्य शून्य शून्य
१८० ,, पूर्ण पूर्ण पूर्ण
२१० ,, पूर्ण त्रिपाद त्रिपाद
२४० ,, आधी पूर्ण आधी
२७० ,, चौथाई चौथाई पूर्ण
३०० ,, शून्य शून्य शून्य
बीच के किसी अंश पर कितनी दृष्टि है यह त्रैराशिक से निकालना
चाहिये।