फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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परिशिष्ट
कालचक्र दशामें अन्तर्दशा
(i) जहाँ तक दशा में अन्तर्दशा समय का प्रश्न है चाहे आप
मेष दशा में सिंह अन्तर्दशा कहिये या मंगल में सूर्य कहिये—
एक ही समय अन्तर्दशा का आवेगा । यदि वार हों
राशियों की दशा में वारहों राशियों की अन्तर्दशा की
सारिणी दी जाती तो बहुत विस्तृत हो जाती इस कारण
ग्रहों की दशा में ग्रहों की अन्तर्दशा दी गई है । दूसरी
बात यह है कि जितना सूर्य में मंगल, उतना ही मंगल
में सूर्य । इस कारण सूर्य × मंगल एक बार ही लिख
दिया ।
(ii) जहां १०० वर्ष की पूर्ण आयु वाले नक्षत्र चरणों में जन्म
होने से राशियों की दशा होती है, मकर या कुम्भ (शनि)
की अन्तर्दशा नहीं होती । इस कारण १०० वर्ष की पूर्ण
आयु की महादशाओं में शनि की अन्तर्दशा या यों कहिये कि
मकर या कुंभ की अन्तर्दशा का समय नहीं दिया गया है।
(iii) पूर्ण आयु ८३ की महादशा में सूर्य (सिंह) तथा चन्द्र की
दशा नहीं होती—इसलिये अन्तर्दशा भी नहीं होती । इसी
कारण सूर्य (सिंह) या चन्द्र (कर्क) की दशा में अन्य
ग्रह (राशि) की अन्तर्दशा का समय या अन्य ग्रह की दशा
में इनकी अन्तर्दशा का समय नहीं दिया गया है ।
(iv) त्रैराशिक के अनुसार शुद्ध गणित करने से, अन्तर्दशा का
समय वर्ष, मास, दिन घड़ी, पल में आता है । सुविधा के
लिये घड़ी पल छोड़ दिये गये हैं । यदि अन्तर्दशाओं का
जोड़ दशा के पूर्ण काल से एक या दो दिन अधिक आवे
तो बड़ी अन्तर्दशाओं में से एक या दो दिन कम कर—
योग दशामान के अनुसार बना लेना चाहिये । इसी प्रकार
यदि अन्तर्दशाओं का योग दशा के पूर्ण मान से कम आवे
तो बड़ी अन्तर्दशाओं में एक या दो दिन जोड़कर—योग
दशामान के समान बना लेना चाहिये ।