फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअट्ठाईसवां अध्याय : उपसंहार ६७३
मैं शालिवाटि (सम्प्रति टिन्नेवेली) का रहने वाला ब्राह्मणों में
श्रेष्ठ ज्योतिषी हूँ। सब अभीष्ट वरों को प्रदान करने वाली भगवती
सुकुन्तला माता की आराधना करके, ज्योतिषियों के आनन्द के लिये इस
फलदीपिका का मैंने निर्माण किया है । मेरा नाम मन्त्रेश्वर है। इसके
पिछले २७ अध्यायों में मैंने निम्नलिखित विषयों का विवेचन किया है।
१. संज्ञाध्याय (परिभाषा) । २. ग्रहों का कारकत्व । ३. वर्ग,
होरा, द्रेष्काण आदि । ४. ग्रहों का बल और उनकी निर्बलता ।
५. किस कर्म से आजीविका प्राप्त होगी । ६. योग । ७. राज
योग । ८. भिन्न-भिन्न ग्रहों का भिन्न-भिन्न राशि में होने से प्रभाव ।
९. यदि मेष आदि लग्न जन्मकुंडली में हो तो उनका प्रभाव । १०.
भार्याभाव । ११. स्त्रियों की जन्मकुंडली में विशेष विचार ।
१२. सन्तान भाव का विचार । १३. बालारिष्ट (बचपन में बच्चों
की मृत्यु) । १४. रोगाध्याय । १५. भावों का फल विवेचन ।
१६. बारह भावों के फल । १७. निर्याण (मृत्यु) १८. दो या
अधिक ग्रहों के योगों का फल । १९. उडुदशा (विंशोत्तरी महादशा)।
२०. भावाधीश के कारण ग्रहों का 'फल । २१. अन्तर्दशा तथा
प्रत्यन्तर्दशा । २२. कालचक्र दशा आदि । २३. अष्टकवर्ग । २४.
अष्टक वर्ग प्रक्रिया जैसी होरा-सार में वर्णित है। २५. मान्दि और
अन्य उपग्रहों का फल । २६. गोचर । २७. सन्यास योग ।