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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६६३
तीन के वेध से भंग (हाथ पैर टूटना) चार के वेध
से मृत्यु ।
१४. (i) सूर्य के वेध से मनस्ताप (चिन्ता, परेशानी) ।
(ii) मंगल ,, द्रव्य-हानि (रुपये की हानि) ।
(iii) शनि ,, रोग और पीड़ा ।
(iv) राहु या केतु के वेध से विघ्न (रुकावट, अड़चन आपत्ति)
(v) चन्द्रमा के वेध से मिला-जुला फल अर्थात् क्षीण चन्द्र
के वेध से अनिष्ट फल, बलवान् चन्द्रमा के वेध से शुभ
फल ।
(vi) शुक्र के वेध से—आदमियों की कुण्डलियों में स्त्रियों से
सहवास, रति, स्त्रियों की कुंडलियों में रति-दोनों की
कुण्डलियों में वस्त्र, आभूषण आदि सुन्दर प्रिय वस्तु
प्राप्ति ।
(vii) बुध का वेध होने से बुद्धि अच्छी हो, नये विचार सूझें,
ज्ञान की वृद्धि हो, वार्तालाप में सफलता-ख़ुशी देने वाले
पत्र या समाचार आवें ।
(viii) बृहस्पति के वेध से सब शुभ फल ।
१५. (i) यदि ग्रह वेध के समय वक्री हो तो दुगुना फल देता
है । पाप ग्रह हो तो दुगुना कष्ट । शुभ ग्रह हो तो
दुगुना लाभ या प्रसन्नता ।
(ii) यदि ग्रह वेध के समय अपनी उच्च राशि में हो तो तिगुना
फल
(iii) सामान्य राशि में हो तो सामान्य फल।
(iv) नीच राशि में हो तो आधा फल ।