फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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का क्रूर वेध हो तो हानि (घाटा, नुकसान) (iv) चार
का क्रूर वेध हो तो रोग (बीमारी) (v) पांचों का क्रूर
वेध हो तो मृत्यु ।
यदि जन्म राशि—शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य इन
पांचों से वेध में आवे तो भी मृत्यु या मृत्यु सदृश कष्ट
होता है ।
(ii) जैसे पाप ग्रहों से वेध का ऊपर कष्ट फल बताया
गया है उसी प्रकार शुभ ग्रहों के वेध से शुभ फल
होता है । जितने अधिक (जन्म नक्षत्र, जन्म राशि
आदि का) का जितने अधिक शुभ ग्रह (बृहस्पति आदि) से
वेध होगा उतना ही अधिक शुभ फल होगा ।
(iii) पाप ग्रह और शुभ ग्रह दोनों वेध करते हों तो तार-
तम्य करके फल कहना चाहिये ।
पापग्रह का वेध
१३. (i) साधारणतः जन्म नक्षत्र का वेध होने से भ्रम (इधर
उधर भटकना या मन के विचारों में ऊल जलूल व्यव-
स्था होना) नामक्षर के वेध से हानि, स्वर वेध होने
से हानि, तिथि वेध होने से भय और जन्म राशि के
वेध होने से महाविघ्न—पांचों का एक साथ वेध हो तो
जातक ज़िन्दा नहीं रहता ।
(ii) अब युद्ध के समय (अर्थात् जिस आदमी का शुभा-शुभ
विचार कर रहे हैं वह लड़ाई के मैदान में शस्त्र मेंलड़ रहा
हो) तो एक) जन्म नाम, जन्म नक्षत्र आदि) के वेध से
भय, दो के वेध से धन-क्षय (यदि मुकदमा लड़ रहा हो)