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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 598, कुल 684 में से

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पृष्ठ 598

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५९७.
त्रिंशाधिकफला ये स्यू राशयस्ते शुभप्रदाः ।
पञ्चविंशात्परं मध्यं कष्टं तस्मादधः फलम् ॥३७॥
जिन राशियों में ३० से अधिक बिन्दु हों वे उत्तम हैं। जिनमें
२५ से ३० तक मध्यम और जिनमें २५ से कम बिन्दु हों वे अधम
(निकृष्ट) फल देती हैं ॥३७॥
मध्यात्फलाधिकं लाभे लाभात् क्षीणतरे व्यये ।
यस्य व्ययाधिके लग्ने भोगवानर्थवान् भवेत् ॥३८॥
यदि दशम घर से अधिक ग्यारहवें घर में हों; ग्यारहवें से कम
बारहवें घर में हों और बारहवें से अधिक लग्न में हों वह जातक भोग-
वान् (सांसारिक सुख के साधनों सहित) और अर्थवान् (द्रव्य वाला)
होता है ॥३८॥
मूर्त्यादि व्ययभावान्तं दृष्ट्वा भावफलानि वै ।
अधिके शोभनं विद्याद्धीने दोषं विनिर्दिशेत् ॥३९॥
लग्न आदि भावों में-प्रत्येक में-सर्वाष्टक वर्ग में कितने शुभ बिन्दु
हैं यह देखकर फलादेश करना चाहिये । अधिक बिन्दु लग्न में हों तो
शरीर स्वास्थ्य उत्तम, धन स्थान में अधिक हो तो धन संग्रह विशेष,
सप्तम में अधिक हों तो पत्नी सुख उत्तम, भाग्य में अधिक हों तो विशेष
भाग्योदय आदि उत्कृष्ट फल कहना चाहिये। थोड़े बिन्दु होने से अच्छा
फल नहीं होता ॥३९॥
षष्ठाष्टमव्ययांस्त्यक्त्वा शेषेष्वेव प्रकल्पयेत् ।
श्रेष्ठराशिषु सर्वाणि शुभकार्याणि कारयेत् ॥४०॥