फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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सूर्य ३,३,३३ २,३,४,५ ३,५,७,२ = ४३
चन्द्र २,३,५,२ २,५,२,२ २,३,७,१ = ३६
मंगल ४,५,३,५ २,३,४,४ ४,६,७,२ = ४९
बुध ३,१,५,२ ६,६,१,२ ५,५,७,३ = ४६
बृहस्पति २,२,१,२ ३,४,२,४ २,४,७,३ = ३६
शुक्र २,३,३,३ ४,४,२,३ ४,३,६,३ = ४०
शनि ३,२,४,४ ४,३,३,४ ४,४,६,१ = ४२
लग्न ५,३,५,५ २,६,१,२ २,६,७,१ = ४५
सर्वाष्टक वर्ग योग = ३३७
सर्वाष्टक वर्ग योग
वराहमिहिर ने जो अष्टक वर्ग बनाने के लिये-कहाँ-कहाँ किस-किस
स्थान में प्रत्येक ग्रह से शुभ बिन्दु पड़ते हैं—जो शुभस्थान में दिये हैं—
उनमें और इसमें थोड़ा मतभेद है। अब उपर्युक्त संख्याओं के द्वारा
उदाहरण कुंडली में सर्वाष्टक वर्ग बनाया गया है। देखिये पृष्ठ ५९५
ऊपर सूर्य के लिये ३,३,३,३,२,३, आदि संख्या दी है। सूर्य
वृश्चिक में है इसलिये तह ३,३,३,३,२,३ आदि संख्या वृश्चिक से
प्रारम्भ की हैं। इस लिये सूर्य के आगे-वृश्चिक के नीचे *यह चिह्न
दिया गया है। सब ग्रहों से इसी प्रकार संख्या रखनी चाहिये। चन्द्रमा
मीन में है इस कारण २,३,५,२,२,५,२, २ आदि की संख्या मीने से
प्रारम्भ की है। मीन में यह * चिह्न दे दिया गया है॥३५॥
सर्वकर्मफलोपेतमष्टवर्गकमुच्यते ।
अन्यथा बलविज्ञानं दुर्ज्ञेयं गुणदोषजम् ॥३६॥
अष्टक वर्ग से फलित ज्योतिष देखने का प्रकार बहुत उत्तम है।
बिना अष्टक वर्ग के ग्रहों, राशियों और भावों के—ये बलवान् हैं या
निर्बल यह जानने का और कोई उपाय नहीं है ॥३६॥