फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७९
शून्य बिन्दु का अर्थ है कि कोई बिन्दु नहीं हो । एकाधिपत्य
शोधन के नियम नीचे दिये जाते हैं ।
(क) १, २, ३, ४, ७, ९, १०, १३, १४ की परिस्थिति (हालत)
में कोई शोधन नहीं होता। जैसी संख्या बिन्दुओं की है वैसी ही
रहने दी जाती है ।
(ख) यदि उपर्युक्त नं० ५ या ६ की परिस्थिति हो तो दूसरी
राशि (जिसमें ग्रह नहीं है) में से सब बिन्दु हटा दीजिये । ग्रह युक्त
राशि की संख्या वैसी ही रहेगी ।
(ग) यदि नं० ८ में वर्णित हालत हो तो इस दूसरी राशि में से
उतने ही बिन्दु कर दीजिये जितने पहली राशि (ग्रह युक्त राशि) में
हों । पहली राशि (ग्रहयुक्त) में जितनी संख्या थी उतनी ही रहेगी ।
(घ) यदि नं० ११ की परिस्थिति हो तो—दोनों राशियों में
संख्या हटा कर ० लिख दीजिये ।
(ङ) यदि नं० १२ में वर्णित हालत हो तो—जितनी कम बिन्दु
वाली राशि में संख्या हो उतनी दोनों में कर दीजिये ।
संस्कृत के मूल इलोकों की भाषा इस प्रकार की है कि कई
प्रकरणों में दो पृथक्-पृथक् (अलग, अलग) अर्थ हो सकते हैं—ऐसी
स्थिति में पाठकों की सुविधा के लिये उन अर्थों को अंगीकार किया
गया है जो पराशर से अधिक मेल खाते हैं, जिनमें स्पष्ट पराशर से
मतभेद है वहाँ मंत्रेश्वर का ही मत दिया गया है । यह दर्शनशास्त्र
तो है नहीं कि अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर भिन्न भिन्न शाखाओं
की व्याख्या कर उस विषय को वहीं छोड़ दिया जावे—जैसे भगवद्
गीता में सन्यास परक, निष्काम कर्म परक, भक्ति परक सांख्य, योग
आदि के सिद्धान्तों को प्रतिपादन करने वाले भिन्न-भिन्न अर्थों की
टीका-भाष्य बड़े-बड़े विद्वानों ने की है—कोई विद्वान् कम नहीं—
अब जिसकी जैसी रुचि हो वैसे सिद्धान्त को ग्रहण करे—यह ज्योतिष