फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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(ख) स्वराशि, उच्चराशि, अधिमित्र (ङ) नीच राशि, अधि शत्रु या
या मित्र राशि में होना या शत्रु राशि में होना
(ग) उपचय स्थान में होना (च) अनुपचय स्थान में होना
(क) (ख) (ग) शुभता के द्योतक हैं। (घ) (ङ) (च) अशुभता
के द्योतक हैं। यदि कोई लक्षण शुभता का हो और कोई लक्षण
अशुभता का हो तो मिश्रित फल समझना चाहिए।
कृत्वाष्टवर्गं द्युसदां क्रियादि-
ष्वक्षंविहीने मृतिरेकबिन्दोः ।
नाशो व्ययो भीतिभयार्थनारी-
श्रीराज्यसिद्धिः क्रमशः फलानि ॥११॥
जब अष्टक वर्ग बनाये जा चुकें तो यह देखना चाहिए कि किस
राशि में कितने बिन्दु हैं, यदि किसी राशि में एक भी शुभ बिन्दु न हो
और उसमें ग्रह गोचर वश आंवे तो मृत्यु समान कष्ट हो। यहाँ शंका
यह होती है कि मान लीजिये सूर्य के अष्टक वर्ग में किसी राशि
में कोई भी शुभ बिन्दु नहीं हैं—सूर्य तो उस राशि में प्रत्येक वर्ष
एक महीने के लिए आवेगा। तब क्या प्रत्येक वर्ष उस मास में मृत्यु
के समान कष्ट होगा ?
यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि केवल एक ग्रह मात्र मृत्यु
नहीं करता। जब अनेक ग्रह अनिष्ट होते हैं—दशा, अन्तर्दशा और
गोचर दोनों बिगड़ते हैं तब मृत्यु होती है। और केवल गोचर में भी
जब अनेक ग्रह अनिष्ट होते हैं तब विशेष कष्ट होता है। यदि आठ
ग्रह अनुकूल हुए और केवल एक ग्रह अनिष्ट हुआ तो जैसे आठ लोटे
ठंढे जल में एक लोटा गरम जल बहुत कम गरमाई पैदा करता है वैसे
ही अनिष्ट ग्रह के गोचर का प्रभाव विशेष रूप से अनुभव में नहीं
आता। दूसरे, ऊपर जो मृत्यु कहा गया उसका अर्थ मृत्यु ही नहीं