फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५४७
उतना ही अधिक अशुभ समझना चाहिये । यह साधारण नियम है ।
इसके अतिरिक्त दो बातें और ध्यान में रखनी चाहियें :—
(अ) यदि ग्रह गोचर वश अपनी स्वयं की राशि, अपनी उच्च
राशि या अपने मित्र की राशि में जा रहा हो या उपचय* स्थान में
जा रहा हो तो ख़राब फल में कमी करता है और अच्छे फल को
और भी बढ़ाता है । इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये तीन
बिन्दु है किन्तु स्वराशि और उपचय स्थान में जा रहा है तो
उतना खराब नहीं होगा । यदि ५ बिन्दु हों और उपचय स्थान में
हो—मित्र राशि में हो तो जितना शुभ फल ५ बिन्दु के कारण
करना चाहिये उससे भी अधिक करेगा ।
(ब) यदि ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि या अनुपचय** स्थान में
गोचर वश जा रहा हो तो यदि थोड़े बिन्दु होने के कारण अशुभ
फल देने वाला है तो और भी अशुभ फल करेगा । यदि अनुपचय
राशि में हो—नीच राशि में हो तों अधिक बिन्दु होने के कारण
जैसा शुभ फल करना चाहिए वैसा न करके उससे कम शुभ फल
करेगा । यहाँ एक शंका उठती है । मित्र राशि में तो है लेकिन
अनुपचय राशि में हो या शत्रु राशि में हो किन्तु उपचय राशि में,
तो क्या फल ? इसका उत्तर यही है :
शुभ अशुभ
(क) अधिक बिन्दु होना (घ) थोड़े बिन्दु होना
- लग्न से तीसरा, छठा, दसवाँ, ग्यारहवाँ—यह चार जगह उपचय
कहलाती हैं ।
** लग्न से १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ अनुपचय स्थान
कहलाते हैं ।