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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 684 में से

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पृष्ठ 520

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५१९
मिश्र फल। यदि पाप ग्रह अधिक हों तो अधिक कष्ट, यदि शुभ
ग्रह अधिक हों तो शुभ फल अधिक—यह मिश्र फल का अभिप्राय है
आगे जहाँ भी, 'मिश्र फल' शब्द आवे यही फल समझना चाहिये।
यदि लग्न में उच्च राशि का, अपनी राशि का, मित्र क्षेत्री (मित्र की
राशि में) कोई ग्रह हो तो बहुत उत्तम पद प्राप्त होता है—राजा या
सरकार से सम्मान प्राप्त होता है। यदि ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि या
अस्त होकर लग्न-राशि में हो तो पुत्र कष्ट, स्त्री कष्ट आदि निकृष्ट
फल होते हैं।
(२) यदि जिस राशि का विचार कर रहे हों वह जन्म लग्न से
दूसरे घर में हो तो धन और धान्य की वृद्धि, उत्तम भोजन, स्त्री,
पुत्र सुख, नयी भूमि की प्राप्ति, राजा से सत्कार, विद्या प्राप्ति, वोलने में
प्रवीणता, अच्छे आदमियों की गोष्ठी (सोसायटी) में समय व्यतीत होना
आदि शुभ फल—यदि राशि शुभ हो तो होते हैं। पाप राशि होने
से उलटा फल होता है।
(३) विचारणीय राशि यदि लग्न से तीसरे घर में हो तो महान्
सुख, उत्तम भोजन, पराक्रम तथा धैर्य वृद्धि, विशेष उत्साह, मन पर
संयम—यदि शुभ राशि हो तो यह सब शुभ फल होते हैं।
(४) यदि चतुर्थ घर में राशि हो तो, सवारी प्राप्ति, भूषण,
मकान या जमीन में वृद्धि, तीर्थ यात्रा, बड़े आदमियों की सोसायटी,
चित्त शुद्धि, उत्साह वृद्धि, खेती बाड़ी विशेष हो, स्त्री और पुत्र का सुख,
बन्धुओं में वृद्धि, नवीन जायदाद प्राप्ति, शरीर सुख, लाभ—यदि शुभ
राशि हो तो यह सब शुभ फल होते हैं। पाप-राशि हो तो चतुर्थ
भाव सम्बन्धी अनेक प्रकार के कष्ट और नाश।
(५) यदि राशि लग्न से पाँचवें घर में पड़ती हो तो राजा से
सत्कार, उत्तम पद प्राप्ति, स्त्री, पुत्र सुख, धैर्य, आरोग्य, बन्धुओं का पोषण
अन्नदान, यश, आनन्द और उत्सव के अवसर, धनलाभ, अन्य जनों
का उपकार करना आदि शुभफल होते हैं। यदि पंचम घर में शुभ