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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 684 में से

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पृष्ठ 519

५१८ फलदीपिका
अब कालचक्र दशा का गणित प्रकरण समाप्त किया जाता है।
आशा है-पुस्तक के अन्त में दी गई सारणियों से भुक्त, भोग्य दशा
तथा किस दशा के बाद क्या दशा आती है यह गणित, पाठकों की
समझ में आ गया होगा ।
फलित विचार
अब कालचक्र दशा में राशियों का शुभ या अशुभ फल देखने के
लिये कुछ नियम बताए जाते हैं :--
(१) जिस राशि की दशा का विचार करना हो--वह राशि
बलवान् हो उसमें शुभ ग्रह बैठे हों--उसका स्वामी उस राशि में बैठा
हो, उस राशि पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, जन्म लग्न से वह राशि अच्छे
स्थान में हो, उस राशि का स्वामी बलवान् हो, शुभ ग्रहों से सम्बन्ध
करता हो, जन्म लग्न से अच्छे स्थान में बैठा हो तो उस राशि की दशा
अच्छी कही जाती है।
(२) यदि राशि कमज़ोर हो, उसमें पाप ग्रह बैठे हों, उसका
स्वामी शत्रु राशि या पाप राशि में बैठा हो, उस राशि पर पाप ग्रहों
की दृष्टि हो, जन्म लग्न से वह राशि अनिष्ट स्थान में हो, उस
राशि का स्वामी कमजोर हो (अस्त, नीच राशि नीच या शत्रु नवांश
आदि) उस पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो या पाप ग्रहों से युत हो,
जन्म लग्न से अनिष्ट स्थान में उस राशि का स्वामी बैठा हो तो उस
राशि की दशा अनिष्ट फल करती है ।
अब जन्म लग्न से जिस स्थान पर वह राशि है, इसके तारतम्य
से दशा फल बतलाया जाता है ।
(१) यदि लग्न में हो तो शरीर का आरोग्य, सुख, यश, भूषण
उत्तम पद, धन, पुत्र, स्त्री का सुख । यदि इस राशि का स्वामी
शुभ ग्रह है तो शुभ फल यदि पाप ग्रह की राशि है तो शुभ फल नहीं
होता। यदि पाप ग्रह और शुभ ग्रह दोनों लग्न-राशि में बैठे हों तो