फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७९
विरोध हो, जातक के घर में कन्या का जन्म हो, जातक की मान-
हानि हो या उसे नीचा देखना पड़े तथा उसे और लोगों से कष्ट
पहुँचे ॥६७॥
(iii) केतु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल :
किसी गुरुजन* का मरण हो, अपने आदमियों से विरोध हो,
ज्वर से कष्ट हो, राजा या सरकार की ओर से कलह उपस्थित हो,
वात या कफ जनित रोग हो, किन्तु विदेश जाने से लाभ हो ॥६८॥
(iv) केतु की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल :
अचानक बहुत धन का लाभ हो और बहुत धन का नुकसान भी
हो, पुत्र से विरह हो, घर में ऐसी प्रसूति (बच्चा पैदा होना) हो
जिसके कारण दुःख उठाना पड़े, नौकरों और कन्या-सन्तति का
लाभ हो ।.६८।।
(v) केतु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल :
अपने पुरखे लोगों से कलह हो, अपने बन्धुओं का नाश हो, सर्प,
चोर और अग्नि से भय हो, शत्रु से पीड़ा हो ॥७०॥
(vi) केतु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल :
शत्रुओं के कारण कलह उपस्थित हो, राजा से, अग्नि से और
चोर से भय हो। दुष्ट लोगों की वाणी सुननी पड़े और दूसरे को
हानि पहुँचाने वाले कर्म जातक करे ॥७०॥
(vii) केतु की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा का फल :
श्रेष्ठ पुत्र की उत्पत्ति हो, देवताओं का पूजन हो, पृथ्वी और
धन की प्राप्ति हो अथवा भूमि से धन की प्राप्ति हो, काफी आमदनी
*संस्कृत में गुरुजन का अर्थ गुरु या आचार्य ही नहीं होता है।
पिता, चाचा, ज्येष्ठ भाई, मामा, ताऊ, मौसा, श्वशुर या गुरु—यह
सब गुरुजन के अन्तर्गत आ जाते हैं। माता, दादी, बाबा आदि को भी
गुरुजन में ही समझना चाहिये।