फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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अरिकृतकलहं नृपाग्निश्चौरै-
भयमपि पन्नगजं वदन्ति तज्ज्ञाः ।
खलजनवचनं दुरिष्टचेष्टा
तमसि गतेऽत्र शिखीन्द्रदायमाहुः ॥७१॥
सुतवरजननं सुरेन्द्रपूजा
धरणिधनाप्तिरुपायनार्थसिद्धिः ।
धनचयजननं महीशमानो
भवति गतेऽत्र गुरौ शिखीन्द्रदायम् ॥७२॥
परिजनविहतिं परोपतापं
रिपुजनविग्रहमङ्गभङ्गतां च
धनपदवियुतिं तथाहुराार्या
गतवति सूर्यसुते शिखाधरायुः ॥७३॥
सुतवरजननं प्रभुप्रशस्तिः
क्षितिधनसिद्धिररीश्वरप्रपीडा ।
पशुकृषिविहतिर्भवेत्तु पुंसां
विशति बुधे शिखिवत्सरान्तरालम् ॥७४॥
(i) केतु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल :
शत्रुओं से कलह हो, मित्रों से विरोध हो, अशुभ वचन सुनने
पड़ें, शरीर में बुखार तथा तपिश की बीमारी हो (शरीर के किसी
भाग में जलन या दाह) । दूसरे के घर जाना पड़े और धन का
नाश हो ॥६६॥
(ii) केतु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल :
श्रेष्ठ ब्राह्मण से कलह हो, अपनी स्त्री तथा कुल के लोगों से