फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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(iv) बुध की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल :
सुवर्ण, मूँगा, घोड़े और हाथियों सहित मकान की प्राप्ति हो,
जातक को खाने, पीने का सुख रहे और राजा से सम्मान प्राप्त
हो ॥६०॥
(v) बुध की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल :
सिर में पीड़ा, कण्ठ में बहुत अधिक पीड़ा, नेत्र विकार, कोढ़,
दाद आदि की बीमारी का भय होता है। जातक के प्राणों का संशय
उपस्थित हो जाता है ॥६१॥
हमारे विचार से दोनों बुध और चन्द्र में मारकत्व होने से ही
ऐसा अनिष्टफल होगा अन्यथा नहीं।
(vi) बुध की दशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल :
अग्नि से भय हो, नेत्र रोग हो, चोरी का भय हो, और
जातक सदैव दुःखी रहे। जातक की स्थान हानि हो अर्थात् उसका
पद या मकान छूट जावे, वात रोग से भी कष्ट होने की संभावना
है। यह सब फल बुध की महादशा में जब मंगल की अन्तर्दशा जाती
है तब होते हैं ॥६२॥
(vii) बुध की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल :
मस्तक, नेत्र तथा उदर में पीड़ा हो अपना क्षय हो अर्थात् रोग के
कारण जातक का शरीर कमजोर होता चला जाय या जातक के धन
का नाश हो। अग्नि, विष और जल से भय हो, जातक की मान हानि
हो या जिस पद पर वह कायम हो उस पद से हटाया जाय ॥६३॥
(viii) बुध की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल :
शत्रुओं का नाश हो, रोग से निवृत्ति हो, धार्मिक बातों में सिद्धि
प्राप्त हो और राजा से सम्मान मिले। तपस्या और धर्म की ओर
विशेष अभिरुचि हो ॥६४॥
(ix) बुध की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल :
धर्म और अर्थ का नाश हो, सब कार्यों में विफलता मिले, वात
और कफ के कारण रोग हों ॥६५॥