फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 327, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ फलदीपिका
या पंचम जब गोचरवश शनि आवे तो माता की मृत्यु हो सकती
है । ॥७॥
वदेत्प्रत्यरिनक्षत्रनाथाच्च यमकण्टकम् ।
त्यक्त्वा तद्भवने कोणे गुरौ पुत्रविनाशनम् ॥८॥
जन्म नक्षत्र से पांचवें नक्षत्र का स्वामी जो ग्रह है उसकी राशि,
अंश, कला में से यमकंटक की राशि, अंश, कला घटाइये । जो शेष
बचे उस स्थान पर या उससे नवमपंचम जब गोचरवश बृहस्पति
आवे तो पुत्र की मृत्यु हो सकती है । ॥८॥
लग्नार्कमान्दिस्फुटयोगराशेरधीश्वरो यद्भवनेोपगस्तु ।
तद्राशिसंस्थे पुरुहूतवन्द्ये तत्कोणे वा मृतिमेति जातः ॥९॥
निम्नलिखित को लीजिये : लग्न स्पष्ट, सूर्यस्पष्ट और मान्दि-
स्पष्ट । जो योग आवे उस राशि का स्वामी कहाँ है यह देखिये । उस
स्वामी के स्थान पर या उससे नवम पंचम जब गोचरवश बृहस्पति
आवे तो जातक की मृत्यु हो सकती है । ॥९॥
मान्दिस्फुटे भानुसुतं विशोध्य
राश्यंशकोणे रविजे मृतिः स्यात् ।
धूमादिपञ्चग्रहयोगराशि-
द्रेक्काणयातेऽर्कसुते च मृत्युः ॥१०॥
(i) मान्दि स्पष्ट में से शनि स्पष्ट घटाइये, जो शेष बचे उस पर
या उससे नवमपंचम जब गोचरवश शनि आवे तो जातक की मृत्यु
होती है ।