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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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में विवाह करने से विवाह फलप्रद होगा-त्रिकोण शोधन उत्तर भारतीय
पराशर के और दक्षिण भारतीय होरा रत्नकार बलभद्र के मत में
विभिन्नता-मंत्रेश्वर का मत-प्रश्न मार्ग का मत-त्रिकोण शोधन व्याख्या
तथा उदाहरण सहित-एकाधिपत्य शोधन-राशि, ग्रह, गुणा कार-इन सबसे
विविध फलादेश पृ० ५६२-५९९
२५. पच्चीसवाँ अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ।
गुलिक या मान्दि स्पष्ट करने का गणित प्रकार-यम,-कण्टक, अर्द्ध
प्रहर, काल, धूम, व्यतीपात, परिवेष या परिधि-इन्द्र चाप तथा केतु
स्पष्ट करने की प्रक्रिया-इन सबका विविध भावगत फल ।
पृ० ६००-६१६
२६. छब्बीसवाँ अध्याय : गोचर फल ।
चन्द्र लग्न की प्रधानता, चन्द्र लग्न से सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध,
वृहस्पति, शुक्र, शनि तथा राहु केतु के गोचर वश शुभ और अशुभ स्थान-
वेध फल-प्रत्येक ग्रह का चन्द्र लग्न से विविध भावगत शुभाशुभ फल-
नक्षत्र गोचर-सप्तशलाका-जन्म, आधान तथा कर्म एवं वैनाशिक वश
विचार-जन्म-अनुजन्म, त्रिजन्म नक्षत्र-ग्रह युद्ध-उल्कानिपात-जन्म नक्षत्र
से गिनने पर प्रत्येक नक्षत्र में विविध ग्रहों के संचार वश फल-लत्ता
फल । सर्वतोभद्र चक्र निर्माण प्रकार-गोचर वश फल-पूर्ण व्याख्या
सहित । पृ० ६१७-६६७
२७. सत्ताईसवाँ अध्याय : प्रव्रज्या योग ।
चतुर्ग्रह योग-राशि के अन्तिम भाग के उदय का फल-बलीग्रह की
प्रव्रज्या-चन्द्रद्रेष्काण वश फल-जन्माधिप यदि शनि से दृष्ट हो-सूर्य,
चन्द्र आदि जो ग्रह बलवान् हो उससे प्रव्रज्या प्रकार-तपस्वी योग-यदि