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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१३
प्रत्यन्तर-चन्द्र महादशा में अन्तर और अन्तरों में प्रत्यन्तर-मंगल
महादशा में नौ अन्तर्दशाएँ और उनमें प्रत्यन्तर-राहु महादशा में अन्तर्दशा
और प्रत्यन्तर-गुरु महादशा में अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-बुध महादशान्तर्गत
अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-केतु में अन्तर और प्रत्यन्तर तथा शुक्र महादशा
में नवों अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा । पृ० ४५१-४८५
२२. बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा
कालचक्र महादशा, अन्तर्दशा-महादशा काल-भुक्त भोग्य निकालने
का प्रकार-प्रत्येक नक्षत्र चरण में जन्म होने से विविध राशियों का
दशाक्रम-प्रत्येक राशि का दशा काल-प्रत्येक दशा में अन्तर्दशा काल-राशि
स्वामीवश फल में तारतम्य-गोचरवश प्रभाव-विविध गतियाँ-इन
सबकी पूर्ण व्याख्या उदाहरण सहित-जन्म नक्षत्र से पाँचवें तथा आठवें
नक्षत्र से उत्पन्न, आधान तथा महादशा-निसर्ग दशा-अंश दशा-सत्याचार्य
का मत-पिण्डायुर्दाशा-जीवशर्मा मणित्थ, चाणक्य, मय आदि का मत ।
पृ० ४८६-५३५
२३. तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ।
अष्टकवर्ग से गोचर विचार का सिद्धान्त-सूर्य-चन्द्र, मंगल, बुध,
बृहस्पति, शुक्र तथा शनि के अष्टक वर्ग बनाने की प्रक्रिया-उपचय,
मित्र राशि, स्वोच्च में या अनुपचय, शत्रुराशि या नीच ग्रह से फलादेश
में तारतम्य-एक या अधिक बिन्दुओं का अशुभ या शुभ फल-ग्रह को
लग्न मान शुभाशुभ निर्देश-प्रत्येक राशि की ८ कक्ष्या-कक्ष्यावश शुभाशुभ
काल निर्णय-सर्वाष्टकवर्ग-उदाहरण सहित । पृ० ५३६-५६१ ।
२४. चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग फल
पिता, माता, भ्राता आदि तथा स्वयं का शुभाशुभ काल निर्णय-
अष्टकवर्ग से शुभाशुभ वर्ष निकालने का प्रकार-किस राशि या दिशा,