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सर्वकोश
पाशुपत सूत्र (भगवान् लकुलीश - कौण्डिन्य प्रणीत पञ्चार्थभाष्य सहित पाशुपत दर्शन मूल)

पाशुपत सूत्र (भगवान् लकुलीश - कौण्डिन्य प्रणीत पञ्चार्थभाष्य सहित पाशुपत दर्शन मूल)

Pashupata Sutras of Lakulisha with Panchartha Bhashya

भगवान् लकुलीश (भाष्यकार: कौण्डिन्य) द्वारा

DevanagariSanskritpublished166 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

तन्त्रम् १८६
॥ श्री ॥
पाशुपतसूत्रं
भगवत्कौण्डिन्यविरचितभाष्योपेतम् ।
अथातः पशुपतेः पाशुपतं योगविधिं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
हितार्थमखिलं येन सृष्टं ब्रह्मादिकं जगत् ।
प्रणम्य तं पशुपतिं शिरसा सदसस्पतिम् ॥
अर्थातिशयसम्पन्नं ज्ञानातिशयमुत्तमम् ।
पञ्चार्थं क्रियते भाष्यं कौण्डिन्येनानुपूर्वशः ॥
१. "पञ्चार्थं सम्प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।" इति पाठान्तरम् ।
२. कौण्डिन्य I believe, is the गोत्र name. राशीकर as mentioned
by सायण-माधव in his सर्वदर्शनसंग्रह might be the name, as he has classified
the पाशुपत system into five राशिs; viz., पञ्चार्थ (कार्य, कारण, योग, विधि and
दुःखान्त). This was referred to by श्रीशङ्कर in his वेदान्तसूत्रभाष्य
अ० २, पा० २, सू० ३७ on पाशुपताधिकरण.
There were Eighteen Gurus from नकुलीश to विद्यागुरु. The Seven-
teenth Guru was राशीकर. 'कौण्डिन्य' as a गोत्र or family name, occurs in
वृहदारण्यकोपनिषद् in वंश or गुरुपरम्पराप्रकरण (6th Brahmana of 2nd and
4th Adhyayas) as the 6th in the grade of the teachers under
कौशिक. 'कौशिक' was the direct student under नकुलीश. See गणकारिका
for आचार्य ; Gaekwad's Oriental Series No. 15.

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