परिभाषेन्दुशेखर (नागेश भट्ट - व्याकरण परिभाषा सिद्धान्त एवं भैरवी टीका सटीक)
Paribhashendushekhara of Nagesha Bhatta with Commentary
महामहोपाध्याय नागेश भट्ट (सम्पादक: पं. विश्वनाथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 373 में से
संदर्भ में पढ़ेंमानत्वम्, तद्घटितत्वेन च जराशब्द-पाशब्दयोस्तत्त्वम् । 'सजूस्सजूर्भ्यामि'त्यत्र पूर्व-सजुष्शब्दे तदवयव-षस्य स्वप्रयोज्योपस्थितिविषयपूर्वत्वेऽपि द्वितीयसम्बन्धाभावेन तद्विशिष्टोदासीनवर्णघटितत्वात्तत्त्वसिद्धिः ।"
LOOK AT THAT!
"द्वितीयसम्बन्धाभावेन"!
And in L21: "'जरसावि'त्यत्र जकारे द्वितीयसम्बन्धसत्त्वेऽप्याद्यसम्बन्धाभावान्नातिव्याप्तिः ।"
In जरसौ: on जकार, there IS the द्वितीयसम्बन्ध, but NOT the आद्यसम्बन्ध!
Why does जकार have द्वितीयसम्बन्ध?
Because जकार is an अवयव of जरा!
Wait, what relation does जकार have to जरा?
जकार is a constituent of जरा!
And what about रेफ in निर्जरसौ?
Is रेफ an अवयव of जरा? NO!
Wait! "षष्ठीप्रकृतिविशिष्टो वर्णो निर्शब्दावयव-रेफः"??
Wait, does it say निर्शब्दावयव-रेफः?
Let's re-read L17:
"'निर्जरसावि'त्यत्र निरुक्तोभयसम्बन्धेन षष्ठीप्रकृतिविशिष्ट