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परिभाषेन्दुशेखर (नागेश भट्ट - व्याकरण परिभाषा सिद्धान्त एवं भैरवी टीका सटीक)

परिभाषेन्दुशेखर (नागेश भट्ट - व्याकरण परिभाषा सिद्धान्त एवं भैरवी टीका सटीक)

Paribhashendushekhara of Nagesha Bhatta with Commentary

महामहोपाध्याय नागेश भट्ट (सम्पादक: पं. विश्वनाथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished373 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

अरारावेवेति नियमो न स्यात्, तच्च 'वर्णग्रहणं' एतदप्रवृत्तौ न"
Yes: "गुणवृद्धी अरारावेवेति नियमो न स्यात्, तच्च 'वर्णग्रहणं' एतदप्रवृत्तौ न"

Let's check L5:
"त्वद्रीत्याऽप्यस्याद्यनकारे" vs "त्वद्रीत्याऽप्यासऽद्यनकारे":
Wait, look at L5:
"त्वद्रीत्याऽप्यासऽद्यनकारे"
Wait, look at: 'प्य' then 'ा' then 'स' then 'ऽ' then 'द्य'.
Wait, why is there an avagraha 'ऽ'?
Could it be "त्वद्रीत्याऽप्यसाऽद्यनकारे"?
Wait, in Sanskrit: "त्वद्रीत्या अपि असाद्यनकारे"?
No, "असाद्य"? What is "असाद्य"? No!
What about "त्वद्रीत्याऽप्यस्य आद्यनकारे" -> "त्वद्रीत्याऽप्यस्याऽऽद्यनकारे" or "त्वद्रीत्याऽप्यस्याऽद्यनकारे"?
Look at the letter: is it 'स'?
Could it be 'स्' + 'य' = 'स्य'?
Ah! In some fonts, 'स्य' has 'स' and 'य' attached. But here 'य' looks like... wait, look at 'प्य' then 'ा'?
Wait, look at