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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 170 में से

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पृष्ठ 55

-ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४३
पितृव्यपुत्रः सापत्‍नः परनारीसुतस्तथा।
दाराऽग्निहोत्र-संयोगे न दोषः परिवेदने ॥२८॥
चचेरा भाई, सौतेला भाई तथा पर स्त्री से उत्पन्न हुआ ( दत्तक
आदि ) सुतों को जेठे भाई के रहते, दारसंयोग ( ब्याह ) अथवा
अग्निहोत्र कर लेने में कोई पाप नहीं लगता ॥२८॥
ज्येष्ठो भ्राता यदा तिष्ठेदाधानं नैव कारयेत् ।
अनुज्ञातस्तु कुर्वीत शंखस्य वचनं यथा ॥२९॥
बड़े भाई के रहते छोटा भाई अग्निहोत्र कार्य न करे । किन्तु शंख
के वचनानुसार बड़े भाई की आज्ञा से छोटा भाई अग्निहोत्र कर सकता
है, इसमें कोई दोष नहीं होता ॥२९॥
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥३०॥
यदि कन्या का वाग्दान हो जाने पर पति १. नष्ट, २. मृत,
३. संन्यासी, ४. क्लीब ( नपुंसक ) तथा ५. पतित ज्ञात हो जाय तो
इन पाँच आपत्तियों में कन्या का दूसरा विवाह कर देना चाहिए !
(यहाँ 'पतितेऽपतौ' में 'अपतौ' ऐसा खण्ड है जा 'पतिः समास एव'
से घि संज्ञा, तथा 'अच्च घेः' सूत्र से ङि को 'औ' तथा घि को अत् हो
गया है, 'न पतिः अपतिस्तस्मिन्नपतौ' ऐसा विग्रह करना चाहिए ।
जिसका अर्थ है—'ईषत् पतौ' क्योंकि नञ् का ईषत् अर्थ होता है। जैसे
'अनुदरा कन्या' अर्थात् वाग्दानान्तरं सप्तपदाक्रमणात् पूर्वम् )
अन्यथा वक्ष्यमाण ३१वें श्लोक से विरोध होगा ॥३०॥
मृते भर्त्तरि या नारी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता ।
सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥३१॥