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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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३८ पाराशरस्मृतिः [ चतुर्थो-
तप्तकृच्छ्र व्रत की विधि इस प्रकार है—व्रत करनेवाला पुरुष
तीन दिन तक उष्ण जल पीवे, पश्चात् तीन दिन गरम दूध पीवे, फिर
तीन दिन तक घी पीवे और उसके बाद तीन दिन तक कुछ न खाये ।
इस प्रकार १२ दिन का एक तप्तकृच्छ्र होता है ॥ ७ ॥
षट्पलं तु पिबेदम्भस्त्रिपलं तु पयः पिबेत् ।
पलमेकं पिबेत् सर्पिस्तप्तकृच्छ्रं विधीयते ॥ ८ ॥
उपर्युक्त व्रत में विहित जलादि का परिमाण इस प्रकार है—छः
पल ( २४ तोले ) जल प्रतिदिन, तीन पल ( १२ तोले ) दूध प्रतिदिन,
एक पल ( ४ तोले ) घी प्रतिदिन पीवे । यही तप्तकृच्छ्र व्रत में पीये
जानेवाले जल, दूध तथा घी का परिमाण है ॥ ८ ॥
यो वै समाचरेद् विप्रः पतितादिष्वकामतः ।
पञ्चाहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा ॥ ९ ॥
जो ब्राह्मण अनिच्छा से पतितों के साथ पाँच, दश अथवा बारह
दिन तक निवास करे ॥ ९ ॥
मासार्द्धं मासमेकं वा मासद्वयमथापि वा ।
अब्दार्द्धमब्दमेकं वा १तदूर्ध्वं चैव तत्समः ॥१०॥
अथवा पतितों के साथ पन्द्रह दिन, एक महीना, दो महीना, छः
महीना वा एक वर्ष निवास करे, तो उसे वक्ष्यमाण ( आगे कहे गये )
प्रायश्चित्त करना चाहिए। एक वर्ष के बाद अनिच्छा से भी पतित
संसर्ग करने पर वह उन्हीं के तुल्य हो जाता है । ( उसके लिए कोई
प्रायश्चित्त नहीं है ) ॥ १० ॥
त्रिरात्रं प्रथमे पक्षे द्वितीये कृच्छ्रमाचरेत् ।
तृतीये चैव पक्षे तु कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥११॥
१, 'भवेदूर्ध्वं हि तत्समः' इति क्वचित्पुस्तके ।